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    Home»Featured»15 अगस्त 2026 की सुबह ‘अमृत’ के दौर में लहूलुहान ‘कलम’: भारतीय लोकतंत्र के आहत प्रांगण से एक गद्य-क्रंदन
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    15 अगस्त 2026 की सुबह ‘अमृत’ के दौर में लहूलुहान ‘कलम’: भारतीय लोकतंत्र के आहत प्रांगण से एक गद्य-क्रंदन

    Deepak SahuBy Deepak SahuAugust 14, 2026
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    वर्ष में एक बार जब राजधानी का आकाश तिरंगे के रंगों से सजता है और सरकारी उद्घोषकों के कंठ से ‘दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र’ की गाथाएँ फूटती हैं, तो प्रतीत होता है कि हम न्याय और समता के किसी अनाम स्वर्ग में विचर रहे हैं।
    किंतु, जैसे ही इन उत्सवों की जगमगाहट छँटती है, सड़कों पर बिछा सन्नाटा एक कड़वी हकीकत बयाँ करता है। संसद की ड्योढ़ी से लेकर राज्यों की चौखटों तक, जहाँ-जहाँ अन्याय के विरुद्ध किसी छात्र की आवाज़ गूँजती है, वहाँ-वहाँ इस लोकतंत्र का दमनकारी चेहरा बेनकाब हो जाता है।
    शास्त्रों में कहा गया था कि ‘विद्या विचारी तं परोपकारी’, किंतु आधुनिक सत्ता के न्यायशास्त्र में लिखा है—‘विद्या विचारी तं अपराधी’। जब चेतना का अग्रदूत यानी देश का युवा अपने अधिकारों की भिक्षा नहीं, बल्कि उनका अधिकार माँगता है, तो सत्ता के पास संवाद के लिए शब्द नहीं, बल्कि अश्रुगैस के गोले, कटीले डंडे और बारूद की भाषा बचती है।

    आघात, अपमान और सत्ता का अहंकार

    इतिहास के पन्नों को उलटकर देखें, तो किसी भी निरंकुश व्यवस्था का पहला निशाना हमेशा प्रश्न पूछने वाला मन रहा है।
    जब विरोध के स्वर को दबाने के लिए सड़कों पर हिंसक बल का प्रयोग होता है और न्याय की गुहार लगाती नवयुवतियों के स्वाभिमान को सार्वजनिक रूप से आहत किया जाता है, तो वह केवल शरीर पर लगी चोट नहीं होती—वह राष्ट्र की आत्मा पर लगा एक अमिट घाव होता है।
    “जहाँ तर्क की मृत्यु हो जाती है, वहाँ लाठी शासन करती है। और जहाँ संवाद का अंत होता है, वहाँ सत्ता अपनी कायरता को ‘कानून-व्यवस्था’ का नाम देती है।”
    जब बेटियों की गरिमा को धूल धूसरित किया जाए, उनकी निजता को बाज़ार में उछाला जाए और उनके परिजनों को भय तथा मानसिक प्रताड़ना के दुष्चक्र में धकेला जाए, तब समाज की नैतिक चेतना पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। क्या यह वही सभ्यता है जिसने स्त्री को शक्ति का पर्याय माना था? या फिर यह सत्ता के मद में चूर एक ऐसा तंत्र है जो केवल अपनी आज्ञाकारिता चाहता है, विवेक नहीं?

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    वैचारिक दरिद्रता और लांछन की राजनीति

    जब राज्य के कर्णधार किसी जागरूक नागरिक या संघर्षरत छात्रा के प्रश्नों का उत्तर देने में असमर्थ हो जाते हैं, तो वे कुंठा में आकर लांछन का आश्रय लेते हैं।
    किसी को ‘इतिहास का कलंक’ बता देना, तो किसी को ‘राष्ट्रविरोधी’ की संज्ञा दे देना—यह इस बात का प्रमाण है कि सत्ता बौद्धिक रूप से पूरी तरह दरिद्र हो चुकी है।

    लाठी बनाम तर्क:

    सत्ता डंडों से हड़्डियाँ तो तोड़ सकती है, किंतु उन विचारों को नष्ट नहीं कर सकती जो न्याय की भूमि पर उपजे हैं।
    भय का व्यापार: सोशल मीडिया के अंधियारे कोनों से दी जाने वाली धमकियाँ दरअसल एक भयभीत तंत्र की निष्प्राण गूँज मात्र हैं।

    स्वाधीनता के वास्तविक मायने क्या हैं?

    यदि स्वाधीनता केवल एक संविधान का ढाँचा भर है और लोकतंत्र मात्र पाँच वर्षों में एक बार उँगली पर लगने वाली नीली स्याही—तो हमें सहर्ष स्वीकार कर लेना चाहिए कि हम एक मुगालते में जी रहे हैं।

    “जिस दिन देश के युवाओं को अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर रक्त न बहाना पड़े, जिस दिन स्त्री की आवाज़ को अपमान के तमस में न ढकेला जाए—केवल उसी भोर को ‘आज़ादी’ कहा जाएगा।”

    15 अगस्त का सूर्य हर वर्ष उगता है और ढल जाता है। किंतु जब तक इस देश का छात्र अपने ही प्रांगण में आहत है, जब तक उसकी मेधा और गरिमा को सत्ता के बूटों तले रौंदा जा रहा है, तब तक आज़ादी का यह उत्सव महज़ एक काव्यात्मक विडंबना है। सच्चा लोकतंत्र काग़ज़ के पन्नों पर नहीं, नागरिक के निर्भीक मन में साँस लेता है—और वह मन, फ़िलहाल, न्याय की प्रतीक्षा में है।

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    (लेखक :- राकेश प्रताप सिंह परिहार, राष्ट्रीय महासचिव ( अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति) पत्रकार सुरक्षा कानून के लिए संघर्षरत।)

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    Deepak Sahu

    Editor in Chief

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