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    Bhopal: टीईटी मामले को लेकर पसोपेश में मोहन सरकार, डेढ़ लाख शिक्षकों के भविष्य पर लटकी तलवार

    Deepak SahuBy Deepak SahuApril 4, 2026
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    *शिक्षकों के प्रदर्शन से फूली सरकार की सांसें*

    *समाधान खोजने पर सरकार पर बन रहा दवाब*

    भोपाल,/स्वराज टुडे: सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 23 अगस्त 2010 से पहले नियुक्त हुए और कार्यरत शिक्षकों के लिए टीईटी (Teacher Eligibility Test) पास करना अनिवार्य हो गया है। उन्हें दो साल के भीतर यह परीक्षा पास करनी होगी अन्यथा नौकरी पर संकट आ सकता है। इस आदेश के बाद प्रदेश भर के शिक्षक आंदोलन की राह पर चल पड़े हैं। मध्यप्रदेश में टीईटी अनिवार्यता के खिलाफ शिक्षक आंदोलन तेज हो गया है। करीब डेढ़ लाख शिक्षक सड़कों पर उतरने की तैयारी में हैं। 8, 11 और 18 अप्रैल 2026 को चरणबद्ध प्रदर्शन होंगे। शिक्षक संगठनों ने सरकार को चेतावनी दी है कि मांगें नहीं मानी गईं, तो आंदोलन और उग्र होगा। इस दायरे में वे शिक्षक भी आ रहे हैं, जो 2005 और 2008 की भर्ती प्रक्रिया के तहत नियुक्त हुए थे और उस समय लागू नियमों के अनुसार पात्र थे। अब नए नियम लागू होने की आशंका ने पूरे शिक्षा तंत्र में असंतोष पैदा कर दिया है। इसके साथ ही सरकार पसोपेश में नजर आ रही है। क्‍योंकि फैसले पर अमल करती है जो प्रदेश के डेढ़ लाख शिक्षकों की नाराजगी झेलनी पड़ेगी। यहां यह बताना भी जरूरी है कि उप्र सरकार ने शिक्षकों के हित में एक फैसला लिया है कि वह इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट जायेगी। यहां सवाल उठता है कि क्‍या मप्र सरकार भी ऐसा निर्णय ले सकती है।

    शिक्षक बना रहे मोहन सरकार पर दवाब

    शिक्षक टीईटी नियमों में बदलाव, सेवा सुरक्षा और अस्पष्ट आदेशों के विरोध में सरकार पर पुनर्विचार का दबाव बना रहे हैं। इस निर्णय ने न केवल शिक्षा तंत्र में हलचल मचाई है, बल्कि लाखों शिक्षकों के भविष्य को लेकर भी प्रश्न खड़े कर दिए हैं। राज्य सरकार और शिक्षा विभाग द्वारा ऐसे शिक्षकों की सूची तैयार की जा रही है, जिन्होंने अभी तक टीईटी पास नहीं किया है। उस समय के नियमों के अनुसार पूरी तरह पात्र थे। अब अचानक उन पर नई शर्त लागू किए जाने से असंतोष बढ़ गया है। शिक्षकों का मुख्य तर्क यह है कि उन्हें उनके नियुक्ति समय के नियमों के आधार पर ही आंका जाना चाहिए। उनका कहना है कि उन्होंने वर्षों तक सेवा दी है और अब करियर के अंतिम चरण में उन्हें एक नई परीक्षा के लिए बाध्य करना व्यावहारिक नहीं है। इस निर्णय का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यह शिक्षा की गुणवत्ता और शिक्षकों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती को सामने लाता है।

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    मोहन सरकार के सामने चुनौती

    मोहन यादव सरकार के सामने स्थिति चुनौतीपूर्ण है। एक ओर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करना अनिवार्य है, वहीं दूसरी ओर बड़े पैमाने पर शिक्षकों का असंतोष शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। यदि बड़ी संख्या में शिक्षक परीक्षा में असफल होते हैं या आंदोलन तेज होता है, तो इसका सीधा असर स्कूलों में पढ़ाई पर पड़ सकता है। गुणवत्ता और अनुभव- दोनों ही शिक्षा के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। इसलिए जरूरी है कि ऐसा समाधान निकाला जाए, जो न्यायालय के निर्देशों का सम्मान भी करे और शिक्षकों के हितों की रक्षा भी। कानूनी दृष्टि से सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना नहीं कर सकती। यदि वह ऐसा करती है, तो यह न्यायालय की अवमानना का मामला बन सकता है। इसलिए सरकार ने प्रारंभिक स्तर पर आदेश के अनुरूप कार्रवाई शुरू की। राज्य में बड़ी संख्या में ऐसे शिक्षक कार्यरत हैं, जिन्होंने वर्षों तक सेवा दी है और अपने अनुभव के आधार पर शिक्षा व्यवस्था को संभाला है। इन शिक्षकों के लिए अचानक टीईटी पास करना अनिवार्य कर देना न केवल व्यावहारिक कठिनाई उत्पन्न करता है, बल्कि उनके मनोबल पर भी असर डालता है। इसी संदर्भ में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाने की है।

    मध्‍यप्रदेश सरकार के सामने अग्नि परीक्षा

    एक और महत्वपूर्ण पहलू राजनीतिक दबाव का है। शिक्षक एक संगठित और प्रभावशाली वर्ग होते हैं, और बड़े पैमाने पर उनका आंदोलन सरकार के लिए राजनीतिक रूप से भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इसलिए सरकार इस मुद्दे को केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि संवेदनशील राजनीतिक विषय के रूप में भी देख रही है। टीईटी की अनिवार्यता को लेकर मोहन यादव सरकार गंभीर मुसीबत में फंसी नजर आ रही है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद राज्य के लगभग डेढ़ लाख से अधिक कार्यरत शिक्षकों पर टीईटी पास करने की तलवार लटक रही है, जिसके विरोध में शिक्षक संगठन लामबंद हो गए हैं। यह स्थिति सरकार के लिए एक तरफ कोर्ट के आदेश का पालन करने और दूसरी तरफ नाराज शिक्षकों को संभालने की दोहरी चुनौती बन गई है। मामले में अब पूर्व भाजपा विधायकों और सांसदों ने भी शिक्षकों के पक्ष में आवाज उठाना शुरू कर दिया है, जिससे सरकार पर दबाव बढ़ गया है। प्रदेश के डेढ़ लाख से ज्यादा शिक्षक और उनके परिवार सीधे प्रभावित हैं, जो विधानसभा के बाद अब एक बड़ा असंतोष बन सकते हैं। इस मुद्दे का समाधान मोहन यादव सरकार की प्रशासनिक और राजनीतिक योग्यता के लिए एक बड़ी परीक्षा है।

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    भर्ती के बाद नियम बदलने का आरोप

    जब शिक्षकों की भर्ती हुई थी, उस समय टीईटी परीक्षा की अनिवार्यता का कोई प्रावधान नहीं था। शिक्षाकर्मी भर्ती अधिनियम 1997-98, अध्यापक भर्ती अधिनियम 2008 और राज्य शिक्षा सेवा भर्ती अधिनियम 2018 में भी सेवारत शिक्षकों के लिए टीईटी अनिवार्य करने का उल्लेख नहीं है।
    इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शिक्षा क्षेत्र में सुधार लाना एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें कानूनी, प्रशासनिक और मानवीय सभी पहलुओं को संतुलित करना पड़ता है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार, न्यायालय और शिक्षक संगठन मिलकर इस समस्या का समाधान किस प्रकार निकालते हैं। उसे एक तरफ न्यायालय के निर्देशों का पालन करना है और दूसरी तरफ लाखों शिक्षकों की चिंताओं का समाधान भी करना है।

    विजया पाठक की रिपोर्ट 

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    Deepak Sahu

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