काठमांडू/स्वराज टुडे: नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ और मलबे के सैलाब ने हिमालयी क्षेत्र में ऐसी तबाही मचाई कि कई गांव, सड़कें, पुल और बिजली परियोजनाएं देखते ही देखते मलबे में तब्दील हो गईं।
शुरुआती दौर में जब पानी और मलबे का सैलाब पहाड़ों से नीचे आया, तब लोगों को संभलने तक का मौका नहीं मिला। अब जब कई इलाकों में पानी का स्तर घट रहा है, तब इस आपदा की दूसरी और बेहद दर्दनाक तस्वीर सामने आ रही है-मलबे और कीचड़ के बीच से लगातार शव बरामद हो रहे हैं।
1 सितंबर तक नेपाल में मृतकों की संख्या 1,050 तक पहुंच चुकी थी और करीब 4,000 लोग अब भी लापता बताए गए थे। लापता लोगों में विदेशी नागरिक भी शामिल हैं। राहत और बचाव अभियान में नेपाल के साथ भारत और चीन की टीमें भी जुटी हुई हैं।
इस आपदा ने केवल लोगों के घर और रोजी-रोटी नहीं छीनी, बल्कि नेपाल के सामने शवों की पहचान, सुरक्षित संरक्षण और अंतिम संस्कार की भी बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
पानी उतरा तो सामने आया तबाही का दूसरा चेहरा
26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा के पास ग्लेशियर ढहने के बाद अचानक आई बाढ़ ने नदियों का रुख और पानी का बहाव बेहद खतरनाक बना दिया। विशेषज्ञों और रिपोर्टों के मुताबिक, ग्लेशियर के टूटने से भारी मात्रा में बर्फ, चट्टान और मलबा पानी के साथ नीचे आया और नेपाल के रासुवा, नुवाकोट तथा आसपास के क्षेत्रों को प्रभावित करता हुआ आगे बढ़ा। कई स्थानों पर सड़कें और पुल बह गए। संचार व्यवस्था प्रभावित हुई और दूरदराज के इलाकों तक पहुंचना बेहद मुश्किल हो गया। लेकिन आपदा के शुरुआती झटके के बाद अब बचावकर्मियों को एक अलग तरह की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। जैसे-जैसे पानी और कीचड़ कम हो रहा है, वैसे-वैसे मलबे में दबे या बहकर दूर पहुंचे शव सामने आ रहे हैं।
कुछ शवों की पहचान तत्काल नहीं हो पा रही है। ऐसे में प्रशासन के सामने एक साथ कई सवाल हैं-शवों को कहां रखा जाए, उनकी पहचान कैसे हो और अंतिम संस्कार किस तरह किया जाए।
मुर्दाघरों की क्षमता पड़ रही है कम
इतनी बड़ी संख्या में शव बरामद होने के कारण नेपाल के मौजूदा शव संरक्षण ढांचे पर भी भारी दबाव पड़ा है। रिपोर्टों के अनुसार, देश में उपलब्ध मोर्चरी सुविधाएं इतनी बड़ी संख्या में शवों को लंबे समय तक रखने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
इसी कारण कई अज्ञात शवों के सामूहिक अंतिम संस्कार और दफन की व्यवस्था करनी पड़ रही है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, काठमांडू में बड़ी संख्या में अज्ञात शवों के लिए सामूहिक दफन की प्रक्रिया शुरू की गई है। अधिकारियों ने शवों की पहचान भविष्य में संभव बनाने के लिए DNA और अन्य पहचान संबंधी रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की व्यवस्था भी की है।
यह व्यवस्था इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कई परिवार अभी अपने लापता परिजनों की तलाश कर रहे हैं। यदि बाद में किसी शव की पहचान का दावा सामने आता है तो सुरक्षित रखे गए DNA नमूने और अन्य रिकॉर्ड परिवार के नमूनों से मिलान में मदद कर सकते हैं।
कई जिलों में तबाही, चितवन तक बहकर पहुंचे शव
नेपाल की सरकारी प्रसारण सेवा रेडियो नेपाल के मुताबिक, 31 अगस्त तक रासुवा, नुवाकोट, धादिंग, गोरखा, नवलपरासी पूर्व और पश्चिम, तनाहुन और चितवन समेत कई जिले प्रभावित हुए थे।
उस समय तक 939 शव बरामद किए जा चुके थे और 3,900 से ज्यादा लोग लापता बताए गए थे। चितवन में 279 शव मिलने की जानकारी भी दी गई थी।
इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि बाढ़ का पानी शवों और मलबे को कितनी दूर तक बहाकर ले गया। ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाकों से बहता पानी निचले क्षेत्रों तक पहुंचा और अपने साथ मिट्टी, चट्टान, पेड़, घरों का मलबा तथा अन्य सामान लेकर आया। इसी वजह से एक इलाके में लापता हुए लोगों की तलाश दूसरे जिलों तक करनी पड़ रही है।
हजारों लोग अब भी लापता
मृतकों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ लापता लोगों का आंकड़ा भी इस त्रासदी की गंभीरता दिखा रहा है। 31 अगस्त को नेपाल की आपदा प्रबंधन एजेंसी के हवाले से करीब 4,247 लोगों के लापता होने की जानकारी दी गई थी। इनमें बड़ी संख्या में जलविद्युत परियोजनाओं के कर्मचारी और विदेशी नागरिक भी शामिल थे।
1 सितंबर तक मौत का आंकड़ा बढ़कर 1,050 हो गया था, जबकि करीब 4,000 लोग लापता बताए गए। बचाव दलों ने हजारों लोगों को सुरक्षित निकाला है, लेकिन दुर्गम इलाकों में फंसे लोगों तक पहुंचना अब भी बड़ी चुनौती है।
सबसे बड़ा संकट: सुरंगों में फंसे जलविद्युत कर्मचारी
नेपाल की इस आपदा का सबसे खतरनाक हिस्सा जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़ा हुआ है। बाढ़ और मलबे के कारण कई हाइड्रोपावर परियोजनाओं की सुरंगें प्रभावित हुई हैं।
31 अगस्त तक करीब 933 जलविद्युत परियोजना कर्मचारियों के लापता होने की रिपोर्ट सामने आई थी। इनमें से कई के सुरंगों में फंसे होने की आशंका थी। भारी मलबा, टूटी सड़कें, लगातार भूस्खलन और अस्थिर पहाड़ी इलाकों के कारण बचाव अभियान बेहद मुश्किल हो गया है।
सुरंगों में पानी और मलबा भर जाने के कारण बचावकर्मियों को पहले रास्ता बनाना पड़ रहा है। कई जगहों पर भारी मशीनों और नियंत्रित विस्फोटों का इस्तेमाल कर रास्ता खोलने की कोशिश की जा रही है।
भारत ने भी बढ़ाया मदद का हाथ
नेपाल के इस मुश्किल समय में भारत ने भी राहत और बचाव अभियान में महत्वपूर्ण सहयोग दिया है। भारत की विशेष सुरंग बचाव टीम ने नेपाली सेना के साथ मिलकर चिलिमे और लांगटांग के जलविद्युत परियोजना क्षेत्रों में खोज और बचाव अभियान शुरू किया है।
भारतीय तकनीकी टीम में सुरंग विशेषज्ञ, इंजीनियर और मेडिकल स्टाफ शामिल हैं। टीम ने हेलीकॉप्टर से प्रभावित क्षेत्रों का जायजा लेने के बाद जमीन पर अभियान शुरू किया।
रिपोर्टों के अनुसार, चिलिमे क्षेत्र में खराब मौसम और बेहद कठिन भूगोल के बावजूद भारतीय टीम सुरंग के प्रवेश क्षेत्र तक पहुंचने में सफल हुई। लांगटांग क्षेत्र में भी संयुक्त टीम ने सुरंग के अंदर आगे बढ़ने की कोशिश की।
31 अगस्त तक भारत की मदद से नेपाल से 158 भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकाले जाने की जानकारी भी सामने आई थी। भारतीय फॉरेंसिक टीम नेपाल पुलिस के साथ शवों की पहचान और दस्तावेजीकरण में भी सहयोग कर रही है।
शवों की पहचान सबसे बड़ी चुनौती
आपदा के बाद बरामद शवों में कई ऐसे हैं जिनकी तत्काल पहचान संभव नहीं है। कई शव पानी, कीचड़ और मलबे के लंबे संपर्क में रहने के कारण खराब स्थिति में मिल रहे हैं।
ऐसे में DNA प्रोफाइलिंग महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। अधिकारियों की कोशिश है कि शवों को दफन या अंतिम संस्कार करने से पहले उपलब्ध पहचान संबंधी जानकारी सुरक्षित कर ली जाए।
इसका उद्देश्य यही है कि अगर आने वाले दिनों में कोई परिवार अपने लापता सदस्य की तलाश में पहुंचता है, तो वैज्ञानिक तरीके से पहचान की जा सके।
यही वजह है कि मौजूदा हालात में सामूहिक दफन का मतलब पहचान की प्रक्रिया खत्म होना नहीं है। इसके बजाय प्रशासन शवों से जुड़े जरूरी नमूने और विवरण सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहा है।
बचाव अभियान अभी भी जारी
नेपाल सरकार के सामने इस समय दोहरी चुनौती है। एक तरफ हजारों लापता लोगों की तलाश जारी रखनी है, दूसरी तरफ बरामद हो रहे शवों की पहचान और सुरक्षित अंतिम संस्कार सुनिश्चित करना है।
31 अगस्त तक 20,000 से ज्यादा सुरक्षा कर्मियों को राहत और बचाव अभियान में लगाया गया था। हजारों लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है और हेलीकॉप्टरों के जरिए दूरदराज के इलाकों से लोगों को बाहर लाया जा रहा है।
लेकिन पहाड़ों में टूटे रास्ते, पुलों का बह जाना, सुरंगों में भरा मलबा, खराब मौसम और लगातार भूस्खलन राहत अभियान को बेहद कठिन बना रहे हैं।
नेपाल की यह त्रासदी अब केवल बाढ़ की कहानी नहीं रह गई है। यह हजारों परिवारों के इंतजार, सैकड़ों अज्ञात शवों की पहचान, सुरंगों में फंसे कर्मचारियों को बचाने की आखिरी कोशिश और तबाह हो चुके इलाकों को फिर से खड़ा करने की चुनौती बन चुकी है। पानी का सैलाब भले ही कई इलाकों से पीछे हट गया हो, लेकिन उसके पीछे छोड़ा गया मलबा और मानवीय त्रासदी अभी खत्म नहीं हुई है।
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