छत्तीसगढ़
बिलासपुर/स्वराज टुडे: भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास में महात्मा गांधी को प्रायः एक संत, करुणा के प्रतीक और आध्यात्मिक पथप्रदर्शक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। निस्संदेह उनके व्यक्तित्व का यह पक्ष अत्यंत महत्वपूर्ण था, लेकिन गांधी के राजनीतिक व्यक्तित्व को केवल आध्यात्मिकता के दायरे में सीमित कर देना उनके ऐतिहासिक योगदान को अधूरा समझना होगा।
गांधी मूलतः एक असाधारण राजनीतिक रणनीतिकार भी थे। वे समझते थे कि जिस समाज के भीतर जाति, अस्पृश्यता, ऊँच-नीच और सामाजिक विभाजन की गहरी दरारें हों, वह विदेशी सत्ता के विरुद्ध लंबे और व्यापक संघर्ष को प्रभावी ढंग से नहीं लड़ सकता। इसलिए उनके लिए स्वराज केवल अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने का प्रश्न नहीं था; स्वराज का अर्थ भारतीय समाज के भीतर एक ऐसी व्यापक जनचेतना तैयार करना भी था, जिसमें अंतिम पंक्ति में खड़ा व्यक्ति स्वयं को राष्ट्र के संघर्ष का सहभागी महसूस करे।
औपनिवेशिक सत्ता और सामाजिक विभाजन
ब्रिटिश शासन की राजनीति में विभाजन एक महत्वपूर्ण औजार था। धार्मिक, जातीय और सामाजिक अंतर्विरोधों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व तथा प्रशासनिक नीतियों के माध्यम से अलग-अलग पहचान देने की औपनिवेशिक प्रक्रिया ने भारतीय समाज को और जटिल बनाया।
गांधी ने इस परिस्थिति को समझते हुए सामाजिक एकता को राष्ट्रीय आंदोलन की आधारशिला बनाने का प्रयास किया। उनके लिए अस्पृश्यता केवल सामाजिक बुराई नहीं थी; वह राष्ट्रीय एकता के रास्ते की गंभीर बाधा थी।
1920 के असहयोग आंदोलन के दौर में गांधी ने स्वराज के साथ आत्मशुद्धि और अस्पृश्यता-उन्मूलन को जोड़ा। उनका संदेश स्पष्ट था—यदि भारतीय समाज अपने ही करोड़ों लोगों को बराबरी का दर्जा देने के लिए तैयार नहीं है, तो विदेशी शासन से स्वतंत्रता की लड़ाई नैतिक रूप से अधूरी रहेगी।
यहीं गांधी की रणनीति का दूसरा पक्ष सामने आता है। वे सामाजिक सुधार को राजनीतिक संघर्ष से अलग नहीं देखते थे। उनका लक्ष्य था कि स्वतंत्रता आंदोलन केवल शिक्षित या प्रभावशाली वर्ग का आंदोलन न रह जाए, बल्कि समाज के सबसे वंचित व्यक्ति तक उसकी पहुंच बने।
पूना पैक्ट: गांधी और आंबेडकर के बीच निर्णायक टकराव
1932 का पूना पैक्ट गांधी की राजनीतिक रणनीति और उनकी सीमाओं—दोनों को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड के कम्युनल अवार्ड में ‘Depressed Classes’ के लिए पृथक निर्वाचिका का प्रावधान किया गया था। गांधी ने इसका तीव्र विरोध किया और यरवदा जेल में अनशन शुरू किया। दूसरी ओर, डॉ. भीमराव आंबेडकर दलितों के स्वतंत्र राजनीतिक प्रतिनिधित्व को उनके अधिकारों की सुरक्षा के लिए आवश्यक मानते थे।
आखिरकार गांधी और आंबेडकर के बीच बातचीत के बाद 24 सितंबर 1932 को पूना पैक्ट हुआ। पृथक निर्वाचिका के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन व्यवस्था के भीतर वंचित वर्गों के लिए आरक्षित सीटों की व्यवस्था स्वीकार की गई।
पूना पैक्ट को केवल गांधी की रणनीतिक सफलता के रूप में देखना इतिहास को एकतरफा बनाना होगा। यह गांधी और आंबेडकर की वैचारिक असहमति, राजनीतिक दबाव और दलित प्रतिनिधित्व के प्रश्न के बीच हुआ एक ऐतिहासिक समझौता था। फिर भी यह निर्विवाद है कि इस घटनाक्रम ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में सामाजिक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न को केंद्रीय मुद्दा बना दिया।
हरिजन आंदोलन: राजनीति से आगे सामाजिक पुनर्निर्माण
1932 के बाद गांधी ने अस्पृश्यता के विरुद्ध अपने अभियान को और व्यापक बनाया। हरिजन सेवक संघ की स्थापना तथा 1933-34 की उनकी यात्राओं ने इस अभियान को देशव्यापी स्वरूप दिया।
गांधी का तरीका केवल भाषणों तक सीमित नहीं था। वे दलित बस्तियों में जाते, मंदिर प्रवेश के प्रश्न को उठाते, सामाजिक व्यवहार में बदलाव की अपील करते और अपने आश्रमों में अस्पृश्यता के विरुद्ध प्रयोग करते थे।
उनकी दृष्टि में यह केवल सुधारवादी अभियान नहीं था। वे जानते थे कि राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद भी यदि सामाजिक असमानता कायम रहती है, तो स्वतंत्रता का अर्थ अधूरा रह जाएगा।
हालांकि गांधी की भाषा और ‘हरिजन’ जैसी अवधारणाओं पर बाद के वर्षों में गंभीर आलोचनाएं भी हुईं। विशेषकर डॉ. आंबेडकर ने गांधी की सामाजिक दृष्टि और जाति-व्यवस्था के प्रति उनके रुख को पर्याप्त रूप से क्रांतिकारी नहीं माना। इसलिए गांधी के सामाजिक अभियान का मूल्यांकन करते समय उनकी उपलब्धियों के साथ इन आलोचनाओं को भी सामने रखना आवश्यक है।
सामाजिक एकता से जन-आंदोलन तक
गांधी की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धियों में से एक यह थी कि उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को व्यापक जनभागीदारी का आंदोलन बनाया। सत्याग्रह, असहयोग, नमक सत्याग्रह और बाद में भारत छोड़ो आंदोलन जैसे अभियानों ने राजनीति को अभिजात वर्ग के दायरे से निकालकर आम जनता तक पहुंचाया।
यहां गांधी का रणनीतिक कौशल स्पष्ट दिखाई देता है। वे जानते थे कि ब्रिटिश साम्राज्य जैसी विशाल सत्ता को केवल राजनीतिक भाषणों से चुनौती नहीं दी जा सकती। उसके लिए व्यापक सामाजिक लामबंदी, नैतिक वैधता और जनभागीदारी आवश्यक थी।
1942 का भारत छोड़ो आंदोलन इस दीर्घकालिक राजनीतिक प्रक्रिया का चरम था। ‘करो या मरो’ का आह्वान भारतीय जनता में उस व्यापक प्रतिरोध की अभिव्यक्ति बना, जिसकी जमीन दशकों के आंदोलनों और जनसंगठन ने तैयार की थी।
फिर भी स्वतंत्रता को केवल 1942 के आंदोलन का परिणाम मानना इतिहास को सरल बना देना होगा। द्वितीय विश्वयुद्ध, ब्रिटेन की आर्थिक-सामरिक कमजोरी, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन, आजाद हिंद फौज, सैनिक असंतोष और बदलते अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक समीकरण—इन सभी ने ब्रिटिश सत्ता के सामने नई परिस्थितियां पैदा कीं।
गांधी: संत से कहीं अधिक
गांधी को केवल ‘महात्मा’ या ‘संत’ के रूप में देखना सुविधाजनक हो सकता है, लेकिन इतिहास उन्हें इससे कहीं अधिक जटिल और प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में सामने रखता है।
उनकी राजनीति में नैतिकता थी, लेकिन उसके साथ रणनीति भी थी। उनके पास आध्यात्मिक भाषा थी, लेकिन उसके पीछे जनसंगठन की गहरी समझ भी थी। वे सामाजिक सुधार की बात करते थे, लेकिन यह भी समझते थे कि सामाजिक एकता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता का संघर्ष व्यापक नहीं बन सकता।
उनकी अनेक नीतियों और विचारों से असहमति संभव है—और आंबेडकर सहित अनेक समकालीन नेताओं ने उनसे गंभीर मतभेद भी किए। लेकिन इन मतभेदों के बावजूद गांधी की राजनीतिक क्षमता को नकारना इतिहास की जटिलता को नकारना होगा।
गांधी की सबसे बड़ी रणनीतिक समझ शायद यही थी कि स्वराज केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि समाज को राजनीतिक रूप से जागृत करने की प्रक्रिया है।
उन्होंने सामाजिक प्रश्नों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा, करोड़ों लोगों को राजनीतिक संघर्ष का सहभागी बनाया और ब्रिटिश सत्ता के सामने ऐसी जनशक्ति खड़ी करने का प्रयास किया जिसे केवल दमन से समाप्त करना आसान नहीं था।
इसलिए गांधी को केवल संत कहना उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को छोटा करना है। वे एक ऐसे युगीन रणनीतिकार थे, जिन्होंने नैतिकता, जनसंगठन, सामाजिक सुधार और राजनीतिक प्रतिरोध को एक ही संघर्ष की अलग-अलग कड़ियों के रूप में देखा।
गांधी की विरासत का सबसे बड़ा प्रश्न आज भी यही है—क्या राजनीतिक स्वतंत्रता तब पूर्ण मानी जा सकती है, जब समाज का कोई हिस्सा बराबरी और सम्मान से वंचित रह जाए?
राकेश प्रताप सिंह परिहार (राष्ट्रीय महासचिव, अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति, पत्रकार सुरक्षा कानून लागू कराने हेतु संघर्षरत)

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