अनुभव, योग्यता और नियुक्ति प्रक्रिया की जांच से लेकर अभिभावकों की शिकायतों तक, निजी स्कूलों की कार्यप्रणाली पर कलेक्टर और शिक्षा विभाग की सख्त निगरानी जरूरी
रायगढ़/स्वराज टुडे: बच्चों के भविष्य की नींव स्कूल में रखी जाती है। माता-पिता अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा, संस्कार और सुरक्षित वातावरण की उम्मीद के साथ स्कूल भेजते हैं। लेकिन यदि स्कूल में ही बच्चों को डर, अपमान, मानसिक दबाव और शारीरिक दंड का सामना करना पड़े, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। देश के अलग-अलग हिस्सों से समय-समय पर स्कूलों में बच्चों के साथ मारपीट, अनुचित सजा और कठोर व्यवहार की घटनाएं सामने आती रही हैं। ऐसे में स्कूल शिक्षा विभाग की निगरानी व्यवस्था और जिला प्रशासन की जिम्मेदारी को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। जरूरत इस बात की है कि स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा, शिक्षकों के व्यवहार और प्रबंधन की कार्यप्रणाली की नियमित समीक्षा हो।
शिक्षकों की योग्यता और नियुक्ति प्रक्रिया की हो जांच
शिक्षक का काम केवल कक्षा में पढ़ाना नहीं, बल्कि बच्चों की उम्र, मानसिक स्थिति, सीखने की क्षमता और भावनाओं को समझना भी है। बच्चों के साथ संवेदनशील व्यवहार करना एक अच्छे शिक्षक की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। ऐसे में शिक्षकों की शैक्षणिक योग्यता, आवश्यक प्रशिक्षण और नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करना जरूरी है।
यदि किसी शिक्षण संस्थान में व्यक्तिगत संबंधों या सिफारिश के आधार पर नियुक्ति किए जाने, निर्धारित योग्यताओं की अनदेखी होने अथवा अनुभवी शिक्षकों को अनुचित तरीके से हटाए जाने की शिकायतें मिलती हैं, तो संबंधित तथ्यों की जांच की जानी चाहिए। शिक्षा विभाग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी योग्य, प्रशिक्षित और अपने दायित्वों के प्रति संवेदनशील शिक्षकों के हाथों में हो।
अभिभावक शिकायत करें तो बच्चे के साथ न हो भेदभाव
स्कूलों में बच्चों के साथ कथित दुर्व्यवहार की शिकायतों का एक संवेदनशील पहलू यह भी है कि कई अभिभावक शिकायत करने से पहले कई बार सोचते हैं। उन्हें आशंका रहती है कि कहीं उनकी शिकायत का असर बच्चे के स्कूल में व्यवहार, पढ़ाई या परीक्षा पर न पड़ जाए।
यदि शिकायत के बाद अभिभावकों के फोन या संदेशों को नजरअंदाज करने, उन्हें ब्लॉक करने अथवा बच्चे के साथ अलग व्यवहार करने की शिकायत मिलती है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। इसी तरह परीक्षा में जानबूझकर कम अंक देने, बच्चे को कक्षा में अपमानित करने या शिकायत के कारण उसे निशाना बनाने के आरोपों को भी गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
हालांकि किसी भी आरोप को जांच के बिना सही नहीं माना जा सकता, लेकिन शिकायत करने वाले अभिभावक और बच्चे को अपनी बात रखने का उचित अवसर मिलना चाहिए। ऐसी व्यवस्था आवश्यक है, जिसमें माता-पिता बिना किसी दबाव के शिकायत कर सकें और उन्हें यह जानकारी भी मिले कि उनकी शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई।
अनुशासन के नाम पर बच्चों को दंड देना कितना उचित?
स्कूलों में अनुशासन आवश्यक है, लेकिन उसके नाम पर बच्चों को शारीरिक दंड देना, डराना, अपमानित करना या मानसिक दबाव में रखना उचित नहीं है। देर से पहुंचने पर उठक-बैठक कराने, छोटी-सी गलती पर कठोर सजा देने या सबके सामने अपमानित करने जैसी शिकायतों की जांच की जानी चाहिए।
प्रार्थना सभा और सुबह की Assembly के दौरान तेज धूप में लंबे समय तक बच्चों को खड़ा रखने के मामलों में भी उनकी उम्र, मौसम और स्वास्थ्य का ध्यान रखा जाना चाहिए। शिक्षक का व्यवहार ऐसा होना चाहिए कि बच्चा अपनी समस्या या गलती को लेकर बात करने में सहज महसूस करे, न कि शिक्षक के सामने आने से ही घबराने लगे।
बच्चों में अनुशासन विकसित करने के लिए समझाइश, उचित मार्गदर्शन और सकारात्मक व्यवहार अधिक महत्वपूर्ण हैं। शिक्षा का वातावरण ऐसा होना चाहिए, जहां बच्चे भय के बजाय आत्मविश्वास के साथ सीख सकें।
निजी स्कूलों में फीस और अतिरिक्त शुल्क की पारदर्शिता जरूरी
निजी स्कूलों में फीस और अतिरिक्त शुल्क को लेकर भी अभिभावकों की शिकायतों की निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए। प्रतियोगी परीक्षाओं, विशेष शैक्षणिक गतिविधियों और अन्य कार्यक्रमों के नाम पर यदि अनिवार्य भुगतान कराया जा रहा है, तो स्कूल प्रबंधन को उसका स्पष्ट आधार और संबंधित नियमों की जानकारी देनी चाहिए।
अभिभावकों को यह पता होना चाहिए कि कौन-सा शुल्क अनिवार्य है, कौन-सा वैकल्पिक है और किस नियम के तहत लिया जा रहा है। यदि किसी स्कूल में निर्धारित नियमों से हटकर शुल्क वसूली या अन्य अनियमितताएं प्रमाणित होती हैं, तो संबंधित प्रबंधन के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
कागजी निरीक्षण नहीं, स्कूलों की वास्तविक स्थिति जानना जरूरी
स्कूल शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन की जिम्मेदारी केवल दस्तावेजों की जांच तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। समय-समय पर स्कूलों का निरीक्षण कर वहां बच्चों के साथ होने वाले व्यवहार, शिक्षण व्यवस्था, शिक्षकों की योग्यता, अनुशासन के तरीकों और शिकायत निवारण प्रक्रिया की भी समीक्षा की जानी चाहिए।
विशेष रूप से निजी स्कूलों में निरीक्षण की ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें अभिभावकों की समस्याओं को भी महत्व दिया जाए। केवल स्कूल प्रबंधन से जानकारी लेने के बजाय माता-पिता से सीधे संवाद करने पर वास्तविक स्थिति को समझने में मदद मिल सकती है।
कलेक्टर स्वयं अभिभावकों के साथ करें बैठक
इस पूरे मामले में जिला कलेक्टर की पहल महत्वपूर्ण हो सकती है। कलेक्टर की अध्यक्षता में अभिभावकों के साथ नियमित बैठक आयोजित की जाए, जिसमें माता-पिता को स्कूलों की व्यवस्था, शिक्षकों के व्यवहार, फीस और बच्चों की सुरक्षा से जुड़ी समस्याएं खुलकर रखने का अवसर मिले।
बैठक में शिक्षा विभाग के संबंधित अधिकारी भी उपस्थित रहें और प्राप्त शिकायतों का रिकॉर्ड तैयार कर उनकी समयबद्ध जांच सुनिश्चित करें। जरूरत पड़ने पर अभिभावकों से गोपनीय रूप से भी फीडबैक लिया जाए, ताकि किसी बच्चे की पहचान उजागर होने या शिकायत के बाद उसे परेशानी होने की आशंका कम की जा सके।
शिकायतों के लिए स्पष्ट हेल्पलाइन या शिकायत पोर्टल की व्यवस्था, जांच की समयसीमा और कार्रवाई की निगरानी भी जरूरी है। गंभीर अनियमितताएं प्रमाणित होने पर जिम्मेदार व्यक्तियों और स्कूल प्रबंधन के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए। जहां नियम इसकी अनुमति देते हों, वहां सक्षम प्राधिकारी द्वारा स्कूल की मान्यता रद्द करने जैसे कदमों पर भी विचार किया जा सकता है।
बच्चों की सुरक्षा और सम्मान से कोई समझौता नहीं
स्कूल शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य केवल बच्चों को शिक्षित करना नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित वातावरण में आगे बढ़ने का अवसर देना भी है। इसके लिए शिक्षक की नियुक्ति से लेकर उसके व्यवहार तक जवाबदेही सुनिश्चित करना जरूरी है। अभिभावकों की शिकायतों को हल्के में लेने के बजाय उनकी गंभीरता से जांच होनी चाहिए और किसी भी बच्चे को शिकायत करने की कीमत नहीं चुकानी चाहिए।
अब समय है कि जिला प्रशासन और स्कूल शिक्षा विभाग इस विषय पर ठोस पहल करें। नियमित निरीक्षण, पारदर्शी फीस व्यवस्था, योग्य शिक्षकों की नियुक्ति और अभिभावकों के साथ सीधा संवाद सुनिश्चित किया जाए। आखिरकार, बच्चों का भविष्य केवल माता-पिता की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि स्कूल प्रबंधन, शिक्षकों और पूरे शिक्षा तंत्र की भी समान रूप से महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
जनहित में मांग: कलेक्टर स्वयं अभिभावकों के साथ बैठक कर स्कूलों की वास्तविक स्थिति जानें। माता-पिता को खुलकर अपनी शिकायतें रखने का अवसर मिले, ताकि बच्चों के साथ दुर्व्यवहार, अनुचित दंड और फीस संबंधी शिकायतों पर निष्पक्ष जांच व उचित कार्रवाई सुनिश्चित हो सके।
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