उत्तरप्रदेश
वाराणसी/स्वराज टुडे: वाराणसी का कफ सिरप ‘किंग’ शुभम जायसवाल फरार है, मगर उसके काले कारनामे के चर्चे पूरे देश में हो रहे हैं, न वह सिरप बनाता था न बेचता था, फिर भी महज 3 साल में ही उसने एक ऐसा काला कारोबार खड़ा किया, जिसकी मदद से 150 करोड़ रुपये से ज्यादा कमाए.
कभी बाइक पर चलने वाला युवक देखते ही देखते इतनी बड़ी शख्सीयत बन गया कि बनारस के हर गली चौराहे पर उसके होर्डिंग नजर आने लगे.
दबी जुबान से लोग ये भी कहते हैं शुभम को सफेदपोशों से खूब मदद मिली, वह नेता बनना भी चाहता था, कॉलेज के दिनों से ही उसकी ये ख्वाहिश थी. पैसे न होने की वजह से ये पूरी नहीं हो पा रही थी तो उसने पहले पैसा कमाना ही शुरू किया. इसके लिए फर्जी मेडिकल स्टोर खड़े किए, एक ऐसा नेटवर्क साधा जिससे कागजों में सब दुरुस्त लगे, माल की बिक्री भारत में दिखाई, मगर असल में इसे बांग्लादेश भेजा. वहां 120 रुपये की एक बोतल को 1200 से 1800 रुपये तक बेचा गया.
क्या है पूरा मामला?
कफ सिरप मामले में शुभम जायसवाल का नाम तब खुला जब ऐबट कंपनी के कोडीन युक्त कफ सिरप की 89 लाख बोतलें गायब होने की बात सामने आई. मामले की जांच शुरू हुई तो सामने आया कि बनारस में ही अकेले 50 लाख बोतलें खपाने का दावा किया गया था, जिन 28 मेडिकल स्टोरों को ये बोतलें भेजी गईं थीं, वह असल में हैं ही नहीं, जिन गोदामों का पता दिया गया था, वहां कुछ नहीं मिला. ड्रग इंस्पेक्टर जुनाब अली ने इस मामले में शुभम जायसवाल, उसके पिता भोला प्रसाद और अन्य 26 दवा कारोबारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया. इस मामले में एनडीपीएस एक्ट, मनी लॉन्ड्रिंग और क्रिमिनल कॉन्स्परेसी का मामला दर्ज किया है.
क्या है शुभम की कहानी?
शुभम की ये कहानी शुरू हुई थी 2019-20 से, वाराणसी के हरिश्चंद्र कॉलेज में वह पढ़ाई करता था. वह नेता बनना चाहता था, मगर पैसों की तंगी की वजह से ऐसा कर नहीं पाया. इसी बीच कोरोना आया और शुभम को एक मेडिकल होलसेलर के यहां हिसाब किताब का काम मिल गया. यहां पर उसे पता चला कि कोडीन वाले कफ सिरप की बांग्लादेश में बहुत मांग है, मगर बिना नेटवर्क वह इस धंधे में घुस नहीं सकता था.
ऐसे में उसकी मदद की रांची की शैली ट्रेडर्स कंपनी ने, ऐसा दावा किया जाता है कि शुभम के पिता भोला प्रसाद ही इस फर्म के प्रोपराइटर हैं. इस कंपनी का पहले से एक नेटवर्क था, शुभम ने इसकी मदद से सप्लाई चेन तैयार की और डिस्ट्रीब्यूशन के नाम पर कंपनी से सीधे कफ सिरप खरीदने लगा और उन्हें बांग्लादेश भेजने लगा.
कोडीन क्या होता है?
कोडीन एक नारकोटिक एनाल्जेसिक दवा है, जिसका प्रयोग हल्के दर्द को दूर करने तथा खांसी को कंट्रोल करने के लिए किया जाता है. यह दवा दिमाग पर असर करती है और दर्द के संकेतों को कम करती है, भारत में इसे अन्य मॉलीक्यूल के साथ मिलाकर बनाया जाता है. इस सिरप को खरीदने के लिए डॉक्टर के प्रिस्पक्रिप्शन की जरूरत होती है, क्योंकि ये माना जाता है कि इस तरह की कफ सिरप का प्रयोग नशे के लिए हो सकता है.
बांग्लादेश में शराब का विकल्प है कोडीन
बांग्लादेश में शराब को लेकर सख्त नियम है, यहां मुस्लिम लोगों के लिए शराब को खरीदने या पीने पर पूरी तरह प्रतिबंध है, जबकि गैर मुस्लिमों को परमिट कार्ड बनवाना होता है. विदेशी होटल या बार से शराब ले सकते हैं, मगर इसका भी पूरा लेखा जोखा रखा जाता है. ऐसे में बांग्लादेश के लोग इस सिरप का प्रयोग शराब के विकल्प के रूप में कर रहे हैं. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक यह दवा तस्करी के माध्यम से ही बांग्लादेश में आती है, इसीलिए भारत में जिस सिरप की कीमत 120 रुपये के आसपास है वह बांग्लादेश में 1500 से 1800 रुपये में बिकती है.
बांग्लादेश में क्या हैं नियम?
बांग्लादेश में कोडीन युक्त सिरप भारत से तस्करी किए जाने का कारण ये भी, क्योंकि बांग्लादेश में ड्रग कंट्रोल ऑर्डिनेंस 1982 के तहत कोडीन युक्त खांसी के सिरप पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था, बाद में इसमें ढील दी गई, मगर कोडीन की मात्रा इतनी तय की गई, जिससे नशे में इसका यूज न हो पाए, जबकि भारत में बनी सिरप में कोडीन की मात्रा ज्यादा होती है, इसीलिए इसे तस्करी नेटवर्क से वहां पहुंचाया जाता है.
भारत से कैसे बांग्लादेश जाता है ये सिरप?
भारत में कई फार्मास्युटिकल कंपनियां कोडीन से कफ सिरप बनाती हैं, इनमें तमाम बड़े ब्रांड शामिल हैं, यहां से एक तस्करी नेटवर्क के जरिए ये त्रिपुरा जाती हैं और वहां से बांग्लादेश भेजी जाती हैं, इन सिरप को सीमा पार कराने के लिए एक पूरा नेटवर्क काम करता है. सिरप के दाम ज्यादा होने की वजह से तस्करी का पूरा नेटवर्क बड़ा मुनाफा कमाता है, बांग्लादेश के अंदर भी इसका एक पूरा नेटवर्क है जो शराब का विकल्प चाहने वालों को इसकी बिक्री करता है.
बनारस में कैसे बनाया दबदबा?
शुभम को नेटवर्क मिल गया था, उसने काले कारोबार को बढ़ाना शुरू किया, कंपनी से सीधे माल उठाया और बांग्लादेश भेजना शुरू किया, उसे ये पता था कि अगर सारा माल सीधे बांग्लादेश भेजा तो पकड़ में आएगा, इसीलिए वह लगातार बनारस और प्रदेश के अन्य शहरों में स्थित मेडिकल स्टोरों को सिरप की बिक्री दिखाता था, मगर असल में ये माल सीधा बांग्लादेश भेजा जाता था. अभी तक बनारस के अलावा गाजियाबाद में भी कई ऐसे मेडिकल स्टोर के नाम सामने आ चुके हैं जबकि असल में ये मेडिकल स्टोर हैं ही नहीं.
बदलने लगी लाइफस्टाइल
काले कारोबार से मुनाफा हुआ तो देखते ही देखते बाइक पर चलने वाला शुभम जायसवाल लग्जरी गाड़ियों से चलने लगा. उसके पास डिफेंडर समेत कई लग्जरी गाड़ियां भी हैं. इस बार दीपावली पर उसने पूरे बनारस में मेडिकल होलसेलर और अन्य दवा कारोबारियों को मिठाई भी बंटवाई थी, खास बात ये थी कि जिस डिब्बे में मिठाई भेजी गई थी, उस पर शुभम जायसवाल की फोटो भी लगी थी.
SIT कर रही मामले की जांच
मामलें की परतें खुलने के बाद वाराणसी पुलिस कमिश्नर मोहित अग्रवाल ने स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) का गठन किया. इसके अलावा ED और इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की टीमों ने भी रिकॉर्ड खंगाले, फिलहाल वाराणसी के अलावा गाजियाबाद में भी 1.57 लाख बोतलें कफ सिरप की मिली हैं, ऐसा दावा किया जा रहा है कि ये खेप मेरठ के आसिफ के जरिए देश से बाहर भेजी जानी थी.लेकिन इसके पहले ही पूरे नेटवर्क का भंडाफोड़ हो गया.
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