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    मोहर्रम: ताजिये का नहीं है इस्लाम धर्म से कोई ताल्लुक, भारत समेत इन चार देशों में ही है ताजियादारी की परंपरा

    Deepak SahuBy Deepak SahuJuly 8, 2024
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    नई दिल्ली/स्वराज टुडे: इस्लामिक कैलेंडर का नया साल यानी 1446 हिजरी (Hijri Calender) का पहला महीना मुहर्रम (Muharram ) आज 8 जुलाई 2024 से शुरू हो गया है. मुहर्रम के महीने की 10 तारीख को भारतीय उपमहाद्वीप यानी बांग्लादेश और पाकिस्तान में ताजियादारी की जाती है.

    मोहर्रम में निकल जाती है मातमी जुलूस

    इस मौके पर जहां सुन्नी मुसलमान इमाम हुसैन के इराक के कर्बला स्थित मकबरे की आकृति की बांस की खिम्चियों और चमकीले पेपर से बनी ताजिया निकालते हैं. वहीं, शिया मुसलमान अलम निकालते हैं और इमाम हुसैन की शहादत की याद में मातमी जुलूस निकालने के साथ गम मनाते हैं.

    रविवार की शाम नजर आया मोहर्रम का चांद

    मुहर्रम का चांद 7 जुलाई यानी रविवार की शाम को नजर आया. इसके मुताबिक सोमवार यानी 8 जुलाई को मुहर्रम की पहली तारीख होगी और 17 जुलाई को आशूरा (10 मुहर्रम) होगा.

    दरअसल, मुहर्रम किसी त्योहार का नाम नहीं, ये इस्लामी कैलेंडर के पहले महीने का नाम है. इस महीने की दस तारीख को इस्लाम धर्म में आशूरा के नाम से जाना जाता है. इस महीने की 9 और 10 या 10 और 11 तारीख को दुनियाभर के मुसलमान रोजा रखते हैं. हालांकि, ये रोजा रमजान के रोजे की तरह फर्ज नहीं है. ये स्वैच्छिक है. इस्लाम धर्म में ऐसी मान्यता है कि कयामत भी इसी दिन कायम होगी. लिहाजा, दुनियाभर के मुसलमान इस दिन अल्लाह की इबादत कर अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं. दरअसल, ये रोजा पैगम्बर हजरत मूसा के मिस्र के जालिम राजा फराओ पर विजय की याद में रखा जाता है.

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    10 मुहर्रम को हुई थी इमाम हुसैन की शहादत

    हालांकि, इस्लामी इतिहास में बाद में इस दिन यानी 10 मुहर्रम 61 हि. (10 अक्टूबर 680 ईसवी) को इलाके के स्थान कर्बला के मैदान में एक बड़ा हादसा हुआ, जो दुनियाभर के मुसलमानों के सीने पर खंजर की तरह है. इस दिन तत्काली मुस्लिम शासक यजीद की सेना ने पैगम्बर मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन इब्न अली और उनके परिवार के सदस्यों और साथियों को शहीद कर दिया. इसके बाद ये दिन आशूरा के बजाय इमाम हुसैन की शहादत के लिए याद किया जाने लगा. इमाम हुसैन की शहादत की याद में ही भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में मुसलमान ताजिया निकालते हैं. हालांकि, ये परंपरा सिर्फ भारतीय उपमहाद्वीप के तीन देशों में ही है.

    भारत में ऐसे हुई ताजिए की शुरुआत

    ताजिए का इस्लाम धर्म से कोई संबंध नहीं है. ये विशुद्ध रूप से एक भारतीय परंपरा है, जो भारतीय उपमहाद्वीप यानी भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार के अलावा किसी और इस्लामी देश में ये परंपरा चलन में नहीं है. ताजिए की शुरुआत भारत में बरसों पहले तैमूर लंग बादशाह (8 अप्रैल 1336 – 18 फरवरी 1405) के जमाने में हुई थी. दरअसल, तैमूर लंग शिया संप्रदाय से थे. बताया जाता है कि वह आशूरा के मौके पर हर वर्ष इमाम हुसैन के मजार पर जियारत (दर्शन) के लिए जाते थे, लेकिन बीमारी होने की वजह से एक वर्ष वह कर्बला नहीं जा पाए. दरअसल, वह हृदय रोगी थे. इसलिए हकीमों ने उन्हें सफर के लिए मना किया था. ऐसे में बादशाह सलामत को खुश करने के लिए दरबारियों ने ऐसी योजना बनाई, ताकि इससे बादशाह सलामत खुश हो जाए. इसके बाद दरबारियों ने उस वक्त के कलाकारों को इकट्ठा कर उन्हें इराक के कर्बला में स्थित इमाम हुसैन के रौजे (मकबरे) की आकृति बनाने का आदेश दिया. इसके बाद कुछ कलाकारों ने बांस की खिम्चियों से इमाम हुसैन के मकबरे का ढांचा तैयार किया. इसे तरह-तरह के फूलों से सजा या गया. इसी को ताजिया नाम दिया गया. इस तरह भारत में पहली बार 801 हिजरी संवत को तैमूर लंग के महल में उसे रखा गया. देखते ही देखते तैमूर के ताजिए की धूम पूरे देश में मच गई. देशभर के राजे-रजवाड़े और श्रद्धालु जनता इन ताजियों की जियारत (दर्शन) के लिए आने लगे.

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    सिर्फ इन देशों में निकाले जाते हैं ताजिए

    तैमूर लंग को खुश करने के लिए देश की रियासतों में भी इस परंपरा की शुआत हो गई. खासतौर पर दिल्ली के आसपास के जो शिया संप्रदाय के नवाब थे, उन्होंने तुरंत इस परंपरा पर अमल शुरू कर दिया. तब से लेकर आज तक इस अनूठी परंपरा को भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और बर्मा (म्यांमार) में पालन किया जा रहा है.

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    Deepak Sahu

    Editor in Chief

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