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    मीडिया का बदलता चेहरा: गिग वर्कर पत्रकारिता का उदय और लोकतंत्र पर संभावित खतरे

    Deepak SahuBy Deepak SahuNovember 17, 2025
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    navjivanindia 2017 09 5f74f7d6 533c 4ab9 b6c9 5d9ae34c95ba Journalism
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    भारतीय मीडिया एक भयावह मोड़ पर खड़ा है। यह वह मोड़ है जहाँ अख़बारों की सुर्खियाँ बदलने से पहले, उनके न्यूज़रूम के भीतर की संरचना बदल रही है। टीवी चैनलों के शोर-गुल से ज़्यादा खतरनाक वह ख़ामोशी है, जिसमें बड़ी संख्या में पत्रकार अब स्थायी नौकरी नहीं, बल्कि गिग वर्कर
    (गिग वर्कर वह व्यक्ति होता है जो स्थायी नौकरी (Permanent Job) के बजाय अस्थायी, प्रोजेक्ट-आधारित, ऑन-डिमांड काम करता है। उसे काम के आधार पर भुगतान मिलता है, न कि नियमित वेतन या सुविधाएँ।) बनकर काम कर रहे हैं—सस्ते, असुरक्षित, असंगठित और लगभग बिना अधिकारों के।

    यह बदलाव केवल मीडिया उद्योग की संरचना नहीं बदल रहा, बल्कि लोकतंत्र की रीढ़—स्वतंत्र पत्रकारिता—को कमजोर कर रहा है। सवाल यह है कि जिस पत्रकार का भविष्य ही अनिश्चित हो, वह सत्ता के सामने कितना दृढ़ खड़ा रह पाएगा?

    गिग पत्रकार: अधिकार शून्य, जोखिम अधिक

    आज मीडिया में रिपोर्टिंग का सबसे बड़ा बोझ उन लोगों के कंधों पर है जिनके पास—

    * न स्थायी वेतन,
    * न बीमा,
    * न पीएफ या सुरक्षा,
    * न प्रशिक्षण,
    * न संस्थागत संरक्षण

    और सबसे बड़ी बात — न नौकरी की गारंटी।

    ये पत्रकार “स्ट्रिंगर” या “फ्रीलांसर” कहलाते हैं, पर असल में ये वही गिग वर्कर हैं, जिन्हें प्रति ख़बर, प्रति वीडियो या प्रति फ़ुटेज के हिसाब से पैसे मिलते हैं। वह भी अक्सर देर से, कटौती के साथ, या कई बार—बिल्कुल नहीं।

    वे कैमरा खुद खरीदते हैं, माइक्रोफोन खुद लेते हैं, यात्रा का खर्च खुद उठाते हैं और ख़तरा भी खुद ही झेलते हैं।

    जब किसी दंगे या आपदा में सबसे आगे वही भेजे जाते हैं तो चैनलों के “स्टूडियो सितारों” की रोशनी में उनका नाम भी नहीं आता। जीवन और आजीविका—दोनों पर जोखिम सबसे अधिक उन्हीं का है।

    यह भी पढ़ें :  Patna: एम्स में मिलेगी बिना एग्जाम के नौकरी, 67 हजार मिलेगी सैलरी; 16 से 18 अप्रैल होगा इंटरव्यू

    डिजिटल मीडिया का विस्फोट और स्थायी नौकरियों का पतन

    डिजिटल मीडिया ने नए अवसर जरूर खोले, पर इसके साथ पत्रकारिता में स्थायी नौकरियों का पतन भी तेजी से हुआ।
    YouTube चैनल, डिजिटल पोर्टल, OTT और ऐप—ये सब कम लागत में चलने वाले मॉडल हैं, इसलिए कॉन्ट्रैक्ट-बेस्ड और गिग वर्क ही इनकी रीढ़ बन गया है।

    नतीजतन:

    * 80% वीडियो एडिटिंग
    * 70% फील्ड रिपोर्टिंग
    * 50% कंटेंट राइटिंग
    * 90% थंबनेल/ग्राफिक कार्य गिग वर्कर्स कर रहे हैं।

    टीआरपी और क्लिकबेट की भूख में बड़े संस्थान भी स्थायी पत्रकारों की जगह “स्ट्रिंग नेटवर्क” बढ़ा रहे हैं। पर सवाल है—क्या यह पत्रकारिता है या आउटसोर्स्ड न्यूज़ प्रोडक्शन?

    सिस्टम को फायदा, पत्रकार को नुकसान

    गिग मॉडल संस्थानों के लिए फायदेमंद है:

    * खर्च कम
    * जिम्मेदारी शून्य
    * जोखिम पूरी तरह पत्रकार पर
    * छंटनी का सवाल ही नहीं
    * “अगर तुम नहीं करोगे, कोई और कर देगा” का लाभ

    पर लोकतंत्र का नुकसान असीमित है। जब पत्रकार का भविष्य अस्थिर, आय अनिश्चित और करियर जोखिम में हो, तो वह सत्ता से सवाल पूछने का साहस कैसे जुटाएगा? वह वही खबर भेजेगा जो बिकती है, जो चैनल चाहता है, जो राजनीतिक रवैया सुरक्षित लगता है। पत्रकार अगर स्वयं असुरक्षित है, तो पत्रकारिता कभी स्वतंत्र नहीं हो सकती।

    ग्राउंड रिपोर्टिंग का बोझ गिग पत्रकारों पर

    दिलचस्प यह है कि टीवी पर जो रिपोर्ट हम देखते हैं, उनमें से आधी से अधिक गिग वर्कर्स ही तैयार करते हैं। चैनलों के “रिपोर्टर” अक्सर सिर्फ स्टूडियो में बाइट जोड़ते हैं, जबकि असली मैदान में वही लोग होते हैं जिनका नाम चैनल की वेबसाइट तक पर नहीं लिखा जाता।

    यह भी पढ़ें :  New Delhi: 19 अप्रैल से शुरू होगी चारधाम यात्रा, मंदिर परिसर में रील व मोबाइल पर प्रतिबंध

    “ग्राउंड पत्रकारिता की रीढ़ आज गिग वर्कर हैं— पर सम्मान, सुरक्षा और पहचान—सबसे दूर वही हैं।”

    मीडिया मालिकों को फायदा, समाज का नुकसान

    गिग वर्कर पत्रकारिता ने मीडिया मालिकों को तो सस्ता श्रम दे दिया, लेकिन समाज को दिया:

    * सतही, जल्दबाज़ और अप्रमाणिक कंटेंट,
    * शोर पर आधारित पत्रकारिता,
    * रिसर्च और जांच की हत्या,
    * और लोकतंत्र की कमजोर नींव।

    जो पत्रकार महीने भर का किराया तक न जानता हो कि कैसे आएगा, वह सत्ता, कॉर्पोरेट या माफिया से टकराएगा नहीं। टकराने का नतीजा अगले महीने “नो असाइनमेंट” के रूप में मिलता है।

    क्या समाधान है?

    1. राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया वर्कर्स प्रोटेक्शन कानून
    जिसमें गिग पत्रकारों को भी मान्यता और अधिकार मिले।

    2. न्यूनतम भुगतान मानक (Minimum Standard Rates)
    प्रति स्टोरी, प्रति वीडियो, प्रति फोटो—मानक दरें तय हों।

    3. इंश्योरेंस और सुरक्षा कवर
    फील्ड रिपोर्टिंग जोखिम भरा काम है; यह संस्थान की जिम्मेदारी हो।

    4. गिग पत्रकारों के लिए रजिस्ट्रेशन सिस्टम हो
    ताकि उनका श्रम अमानवीय तरीके से न बिके।

    5. डिजिटल मीडिया के लिए रेगुलेटरी फ्रेमवर्क
    जहाँ गुणवत्तायुक्त पत्रकारिता को प्रोत्साहन मिले, न कि सिर्फ सस्ता कंटेंट।

    लोकतंत्र गिग वर्क के सहारे नहीं चल सकता

    मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, लेकिन अगर इस स्तंभ को संभालने वाले हाथ ही कमजोर, असुरक्षित और असंगठित होंगे, तो पूरा लोकतंत्र अस्थिर हो जाएगा।

    गिग वर्कर पत्रकार सस्ते श्रमिक नहीं, वे इस देश के सबसे महत्वपूर्ण सूचना-सैनिक हैं। उनका भविष्य सुरक्षित करना सिर्फ पत्रकारों का सवाल नहीं— “भारत की लोकतांत्रिक आत्मा का सवाल है।”

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    Deepak Sahu

    Editor in Chief

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