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    Home»Featured»खौफ का दूसरा नाम था चंदन तस्कर वीरप्पन, 200 से ज्यादा आदमियों और 700 से ज्यादा हाथियों की हत्या का था आरोप, आज भी घर-घर सुनाई जाती है वीरप्पन की कहानी
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    खौफ का दूसरा नाम था चंदन तस्कर वीरप्पन, 200 से ज्यादा आदमियों और 700 से ज्यादा हाथियों की हत्या का था आरोप, आज भी घर-घर सुनाई जाती है वीरप्पन की कहानी

    Deepak SahuBy Deepak SahuOctober 6, 2025
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    बंगलुरु/स्वराज टुडे: दक्षिण भारत का घना जंगल, रात की सन्नाटेदार हवा, और अंधेरे में गूंजती हुई गोली की आवाज़… यही था वीरप्पन का साम्राज्य. उसका असली नाम था कूज मुनिस्वामी वीरप्पन, लेकिन लोग उसे ‘डकैतों का राजा’ कहते थे. उसके ठिकाने तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल के जंगल थे. उसका रूप बेहद डरावना था. चेहरे पर उगी मोटी मूंछें, अंगारे की तरह दहकती आंखें और हाथ में हमेशा बंदूक.

    20 साल तक बना रहा छलावा

    वीरप्पन सिर्फ डकैती नहीं करता था बल्कि वह चंदन की लकड़ी और हाथी दांत की तस्करी में भी बड़ा नाम था. कहते हैं उसने 200 से ज़्यादा लोग मारे, जिनमें पुलिस अफसर भी शामिल थे. गांव वाले उसके नाम तक से कांपते थे. लेकिन कहानी का असली रोमांच था, उसका पकड़ में न आना. पुलिस, सेना और विशेष टास्क फोर्स ने मिलकर 20 साल तक उसे पकड़ने की कोशिश की, लेकिन वीरप्पन हमेशा जंगल के अंधेरे में गायब हो जाता.

    कहा जाता है कि रात को जब गाँव के लोग सोते, तो अचानक किसी दरवाज़े पर दस्तक होती… और सामने खड़ा होता वीरप्पन. उसकी आंखों में एक रहस्यमयी चमक होती और लोग डर के मारे कुछ भी देने को तैयार हो जाते. आख़िरकार 2004 में एक स्पेशल ऑपरेशन में पुलिस ने उसे मार गिराया. लेकिन आज भी उसके किस्से दक्षिण भारत के गाँवों में सुनाए जाते हैं… जैसे कोई भूत की कहानी हो.

    15 साल की उम्र में हाथी का शिकार

    वीरप्पन का जन्म 18 जनवरी 1952 को तमिलनाडु के गोपालस्वामीपेट्टा गांव में हुआ था. वह एक गरीब परिवार में पैदा हुआ. बचपन से ही उसका लगाव जंगल से था. वह अपने पिता के साथ जंगल में बकरियां चराता और वहीं से उसने बंदूक चलाना और शिकार करना सीखा. कहते हैं कि दस साल की उम्र में ही उसने पहली बार खरगोश मारा और 15 साल का होते-होते हाथी तक को गोली मार दी थी.

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    वीरप्पन का मामा चंदन की लकड़ी का तस्कर था. उसी ने उसे इस काम में शामिल किया. धीरे-धीरे वीरप्पन को जंगल की हर पगडंडी याद हो गई. पुलिस की नजरों से बचकर निकलना उसका खेल बन गया. जल्द ही उसने अपना एक छोटा सा गिरोह बनाया और फिर आस-पास डकैती डालनी शुरू कर दी.

    सीटी सुनते ही खौफ में पसर जाते थे लोग

    सत्तर के दशक के आखिर तक उसका नाम जंगल के हर कोने में फैल चुका था. वह पुलिस चौकियों पर हमला करता, ग्रामीणों को बंधक बनाता और सरकारी अफसरों को डराकर पैसा वसूलता. लोगों का कहना था कि रात को जब जंगल से अजीब सी सीटी की आवाज आती, तो सब समझ लेते थे कि वीरप्पन आसपास है.

    वीरप्पन का असली धंधा था चंदन और हाथीदांत की तस्करी

    कहते हैं कि उसने अपनी जिंदगी में चंदन के सैकड़ों दुर्लभ पेड़ काटकर करीब 10,000 टन चंदन की तस्करी की. साथ ही 700 से ज्यादा हाथियों को मारकर उनके दांत बेचे. इससे उसने करोड़ों की संपत्ति बनाई और अपने गिरोह को आधुनिक हथियारों से लैस किया.

    बेरहमी के साथ 200 लोगों का किया मर्डर

    कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल की पुलिस ने कई बार उसे पकड़ने की कोशिश की, लेकिन हर बार वह भाग निकलता. जंगल की इतनी गहरी जानकारी शायद ही किसी इंसान को रही हो, जितनी उसे थी. वह पुलिस के आने से पहले ही उनके कदमों की आहट पहचान लेता था. कई बार तो उसने पुलिसवालों को घेरकर मार भी डाला.

    वीरप्पन का खौफ ऐसा था कि उसके गिरोह ने लगभग 200 से ज्यादा लोगों की हत्या की. इनमें पुलिस अफसर, वन विभाग के कर्मचारी और आम लोग शामिल थे. उसके नाम से लोग बच्चों को डराते- ‘सो जाओ, वरना वीरप्पन आ जाएगा.’

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    इतने सालों तक कैसे बचता रहा वीरप्पन?

    कहते हैं कि वीरप्पन सिर्फ डकैत नहीं था, बल्कि उसके कई राजनीतिक दलों से भी रिश्ते थे. कई नेता उसकी मदद करते थे, ताकि वह उनके दुश्मनों को खत्म कर दे या चुनावों में उनके लिए वोट डलवाए. यही वजह थी कि वह इतने सालों तक बचा रहा.

    उसने 1993 में एक बड़ा हमला किया, जिसमें 22 पुलिसकर्मी और वन अफसरों को मौत के घाट उतार दिया. यह घटना इतनी भयानक थी कि पूरा देश हिल गया. इसके बाद उसकी तलाश में करोड़ों रुपये का बजट लगाया गया.

    कन्नड़ स्टार राजकुमार का किया अपहरण

    वीरप्पन अपहरण करने में भी माहिर था. उसने कई मशहूर हस्तियों का अपहरण किया. 2000 में उसने कन्नड़ फिल्म के सुपरस्टार राजकुमार को बंधक बना लिया. पूरे 108 दिनों तक देशभर की सांसें अटकी रहीं. बाद में सरकार को उसकी कई शर्तें माननी पड़ीं, जिस पर वीरप्पन ने उन्हें रिहा किया.

    वीरप्पन के गिरोह में 100 से ज्यादा लोग शामिल थे. इनमें से ज्यादातर जंगल के आदिवासी थे, जो डर और लालच के कारण उसके साथ रहते. कहा जाता है कि उसका गिरोह रात को बिना आवाज किए कई किलोमीटर पैदल चल लेता और सुबह होने से पहले गायब हो जाता.

    और ‘कोकून’ के जाल में फंस गया डकैत वीरप्पन

    वीरप्पन के पास आधुनिक हथियार थे. वह घने जंगलों में छिपकर पुलिस को घात लगाकर मारता. हर पुलिस ऑपरेशन में दर्जनों जवान शहीद होते और वह फिर से हाथ से फिसल जाता. 20 साल तक पुलिस उसकी छाया तक न पकड़ सकी.

    2004 में आखिरकार तमिलनाडु स्पेशल टास्क फोर्स ने ‘ऑपरेशन कोकून’ नामक योजना बनाई. इसमें पुलिस ने उसके विश्वासपात्र लोगों को अपने साथ मिला लिया और वीरप्पन को यह यकीन दिलाया गया कि उसके इलाज के लिए डॉक्टर आएंगे.

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    जंगल से निकालकर पुलिस ने ऐसे किया ढेर

    18 अक्टूबर 2004 की रात वीरप्पन अपने गिरोह के साथ जीप में बैठकर जा रहा था. अचानक जंगल की सड़क पर स्पेशल टास्क फोर्स ने उसे रोक लिया. वीरप्पन कुछ समझ पाता, उससे पहले ही गोलियों की बौछार शुरू हो गई. कुछ ही मिनटों में वीरप्पन और उसके साथियों को ढेर कर दिया गया. उसके मरते ही भारत के सबसे बड़े चंदन तस्कर और डकैत की कहानी खत्म हो गई. लेकिन लोगों के दिलों में उसका खौफ अभी भी जिंदा है.

    आज भी जिंदा है वीरप्पन का खौफ

    वीरप्पन नाम का डकैत भले ही अब इस दुनिया में नहीं है लेकिन आज भी दक्षिण भारत के गांवों में उसके नाम की दहशत अंदर तक बैठी हुई है. उन्हें महसूस होता है कि वीरप्पन कहीं आसपास ही है. वे लोग जब भी जंगल की तरफ देखते हैं, तो कहते हैं, ‘यह वही जंगल है, जहां कभी वीरप्पन का राज था.’ उसके किस्से अब भी भूत की कहानियों की तरह सुनाए जाते हैं.

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    Deepak Sahu

    Editor in Chief

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