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    लोकसभा चुनाव में कम मतदान, कहीं जीत का सेहरा मोदी पर और हार का ठीकरा प्रत्याशियों पर न फोड़ दे भाजपा

    Deepak SahuBy Deepak SahuMay 17, 2024
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    *क्या प्रधानमंत्री मोदी लेंगे सीटों की संख्या में गिरावट की जिम्मेदारी ?

    *कहीं नोटा न फेर दे अरमानों पर पानी ।

    *कम मतदान और नोटा से सकते में बीजेपी ।

    अब तक लोकसभा चुनाव के चार चरण पूरे हो गये हैं। चौथे चरण के साथ ही मध्यप्रदेश में 29 सीटों के लिए होने वाले मतदान की प्रक्रिया पूरी हो गई है। सभी प्रत्याशियों की किस्मत ईवीएम मशीन में कैद हो गई है और हर कोई केवल इसी बात की आशा करके बैठा है कि चार जून को चुनाव परिणाम के साथ ही उनकी चमकती किस्मत के परिणाम भी सामने आयेंगे। चार चरणों में अभी तक जो मतदान प्रतिशत सामने आये हैं उसने निश्चित तौर पर सत्ताधारी दल को सकते में डाल दिया है। मध्‍यप्रदेश सहित पूरे देश में ज्‍यादातर सीटों पर कम मतदान हुआ है। साथ ही मतदाताओं ने इस बार नोटा का भी बहुत उपयोग किया है। कम मतदान और और नोटा का उपयोग यह दर्शा रहा है कि कहीं न कहीं मतदाता मौजूदा मोदी सरकार से नाराज है। हम जानते हैं कि मतदाता वोट का उपयोग तब नहीं करता जब वह सरकार से नाराज होता है। और उसकी सरकार से कोई उम्‍मीद ही नहीं रहती है। यदि बात मध्‍यप्रदेश की बात करें तो यहां पर भी कई सीटों पर काफी कम मतदान हुआ है। जिसके कारण भाजपा सरकार सकते में है। हालांकि कम वोटिंग से हार-जीत में ज्‍यादा अंतर नहीं आने वाला है और मोदी जी की जीत में भी कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है लेकिन यह आंकड़े दर्शाते हैं कि मौजूदा समय में जनता मोदी से उब रही है। सत्ताधारी दल से लेकर विपक्षी नेता तक इस बात को लेकर संशय में हैं कि मत प्रतिशत कम होने के कारण कहीं ऐसा न हो कि उनकी सीटें कम हो जाये। मत प्रतिशत कम होने का सबसे ज्यादा भय मध्यप्रदेश की भारतीय जनता पार्टी की सरकार को है। चिंता इस बात को लेकर भी है। क्योंकि खुद प्रधानमंत्री के चेहरे पर यह पूरा चुनाव लड़ा गया और सभी को इस बात की उम्मीद थी कि मोदी के नाम पर तो जबरदस्त वोटिंग होगी। लेकिन अभी तक जो मत प्रतिशत सामने आये हैं वह बिल्कुल विपरीत हैं।

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    मोदी के नाम पर चलाया कैंपेन

    राजनैतिक सलाहकारों की मानें तो मत प्रतिशत कम होने की सबसे बड़ी वजह रहा है प्रत्याशी की उदासीनता। उदासीनता शब्द का इस्तेमाल यहां करना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि पार्टी ने स्पष्ट तौर से केवल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेहरे को आगे रखकर पूरा चुनावी कैंपेन चलाया। इसमें कहीं से कहीं तक उस जिले और सीट के प्रत्याशी के काम, उसकी छवि और उसके विजन की बात ही नहीं थी। ऐसे में आमजन उस प्रत्याशी पर भरोसा करे भी तो कैसे। अगर पार्टी ने मोदी के नाम पर वोट मांगने की योजना पर काम न किया होता तो निश्चित ही जनता प्रत्याशी पर भरोसा दिखाती और मत प्रतिशत का आंकड़ा कुछ और ही होता।

    आखिर कब तक मोदी-मोदी करेगी भाजपा

    जिस ढंग से भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी के नाम का उपयोग किया है उसे देखते हुए यह अंदाजा अभी से लगाया जाने लगा है कि मोदी के बाद यह पार्टी कई हिस्सों में बंट जाएगी। यही कारण है कि पार्टी ने एक सूत्रीय कार्यक्रम को अपनाते हुए केवल मोदी के चेहरे के नाम पर वोट करने की अपील की। अब देखने वाली बात यह है कि कम मतदान होने की वजह से मत प्रतिशत जो घटा है उसका ठीकरा भारतीय जनता पार्टी किसके ऊपर फोड़ती है। क्या यह ठीकरा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ऊपर फूटेगा या फिर उस सीट से खड़े प्रत्याशी के ऊपर जिसे चुनावी कैंपेन के दौरान दो शब्द भी कहने का अवसर नहीं मिला और न ही कहीं बैनर, फ्लैक्स, पोस्टर आदि में उसकी फोटो का उपयोग किया गया हो।

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    कहीं जनता ने मोदी को सिरे से नकारा तो नहीं

    आंकड़े बताते हैं कि विगत विधानसभा चुनाव की तुलना में लोकसभा चुनाव में मतदान का प्रतिशत कम रहा है। विधानसभा चुनाव में जहां 77.15 प्रतिशत मतदान हुआ था वहीं, लोकसभा चुनाव में 66.77 प्रतिशत मतदाताओं ने वोट डाला है। ऐसे में इतनी तेजी से कम हुए आंकड़े इस बात की ओर इशारा करते हैं कि आमजन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तानाशाही, बेलगाम मंहगाई से नाराज होकर उन्हें सिरे से नाकारने का फैसला किया है।

    प्रत्याशी नहीं बल्कि खुद मोदी लें जिम्मेदारी

    जानकारों की मानें तो मतदान प्रतिशत कम होने का ठीकरा क्षेत्रीय मंत्री और विधायक के ऊपर फोड़ने की बात कुछ दिन पहले ही केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भोपाल में कही थी। लेकिन अमित शाह को इस बात को बहुत अच्छे से समझ लेना चाहिए कि आम जनता अपने क्षेत्रीय नेता और प्रत्याशी से जुड़ी होती है। ऐसे में अगर आप उस व्यक्ति के चेहरे को आगे रखकर वोट नहीं मांगेंगे तो भला जनता कैसे उस चेहरे पर विश्वास करे जिसे उसने कभी अपने गली, मोहल्ले, शहर में पाया ही नहीं। ऐसे में अगर मत प्रतिशत कम होने की वजह से भाजपा की सीटें मध्यप्रदेश में कम होती है तो इसकी जिम्मेदारी स्वयं प्रधानमंत्री मोदी को लेना चाहिए।

    भाजपा के लिए कम मतदान बना चिंता का विषय

    भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने बातचीत के दौरान कहा, “केंद्रीय भाजपा टीम ने आंकड़ों का विश्लेषण किया और पाया कि महिला मतदाता जो लाडली बहना योजना की लाभार्थी हैं, पहले दो चरणों में बड़ी संख्या में नहीं आईं, जैसा कि उन्होंने विधानसभा चुनावों के दौरान किया था। कई कार्यकर्ताओं ने भी पूरी ताकत से प्रचार नहीं किया। केंद्रीय नेतृत्व को पार्टी कार्यकर्ताओं को कई हलकों में अति-आत्मविश्वास से बचाने के लिए चेताना पड़ा।” कहा जाता है कि महिला कल्याण लाभार्थियों और उनके बीच पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान की सकारात्मक छवि ने पार्टी को विधानसभा चुनाव में भारी जीत दर्ज करने में मदद की थी।

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    मौजूदा भाजपा सांसदों के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर

    कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में मौजूदा सांसदों के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर के कारण भाजपा को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। उदाहरण के लिए राजगढ़ में दो बार के सांसद रोडमल नागर जो पूर्व कांग्रेस सीएम दिग्विजय सिंह के खिलाफ खड़े हैं, उन्हें अपनी पार्टी के भीतर कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। प्रचार के दौरान नागर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता पर काफी भरोसा जताया। इसके अलावा, केंद्रीय मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते (मंडला), गणेश सिंह (सतना), आलोक शर्मा (भोपाल) और भरत सिंह कुशवाहा (ग्वालियर) जैसे उम्मीदवार जो विधानसभा चुनाव हार गए थे, उन्हें लोकसभा की लड़ाई के लिए चुना गया। ऐसे में कांग्रेस को इन सीटों से फायदा होने की उम्मीद है।

    कहीं नोटा न बिगाड़ दे प्रत्‍याशियों के आंकड़े

    मध्यप्रदेश में 2014 में नोटा को 3,91,771 और 2019 में 3,40,984 मत मिले थे। जो 29 लोकसभा सीट वाले मध्य प्रदेश में बहुत ज्यादा मायने नहीं रखते हैं। 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने ईवीएम में नोटा का विकल्प देने का आदेश दिया था। इसके मुताबिक यदि मतदाता को चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों में से कोई पसंद नहीं है तो वह ईवीएम में नोटा का बटन दबा सकता है।

    *विजया पाठक की रिपोर्ट*

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    Deepak Sahu

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