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    माडवी हिड़मा ढेर लेकिन रहस्य अब भी बरकरार, क्या साजिश के तहत हुआ एनकाउंटर ? क्या केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के सामने वाहवाही पाने विजय शर्मा ने करवाया हिड़मा का एनकाउंटर ?

    Deepak SahuBy Deepak SahuDecember 10, 2025Updated:December 10, 2025
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    Madvi Hidma
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    * माडवी हिड़मा जैसा नक्सली टॉप कमाण्डर के समर्पण के बाद नक्सलियों की मनीट्रेल, उनके पीछे के असली मास्टरमाइंड हो ज़ाते उजागर, भारत से हो जाता लाल आतंकवाद समाप्त

    * क्या सुकमा के चिंतागुफा थाने में किया गया था हिड़मा का एनकाउंटर ?

    रायपुर/स्वराज टुडे: लाल आतंक का सबसे दुर्दांत नक्सली माडवी हिड़मा उर्फ देवा मारा गया। सूत्रों की माने तो हिड़मा तेलंगाना में आत्मसमर्पण करने वाला था। बस्तर आईजी सुन्दराज ने हिड़मा को छत्तीसगढ में आत्मसमर्पण के लिए तैयार भी कर लिया था पर शायद प्रदेश के गृहमंत्री यह नहीं चाहते थे। सूत्रों के अनुसार सुकमा के चिंतागुफा थाने में हिड़मा का खात्मा किया गया था। नक्सली संगठन की रणनीतिक रूप से सक्रिय कमांडर हिडमा के एनकाउंटर ने राज्य की कानून–व्यवस्था, नक्सल उन्मूलन अभियान और पुलिस–प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    लंबे समय से राज्य की सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बने हिड़मा की मौत को एक बड़ी सफलता के रूप में पुलिस ने प्रस्तुत किया, लेकिन इसके बाद राजनीतिक बयानबाजी, तथ्यगत शंकाओं और गोपनीय परिस्थितियों ने इस एनकाउंटर के पीछे की वास्तविकता पर बहस को जन्म दिया है।  हिड़मा लंबे समय से नक्सली गतिविधियों की मुख्य समन्वयक माना जाता रहा है। कई जिलों में उसके खिलाफ हत्या, अपहरण, विस्फोटक निर्माण, पुलिस बलों पर घात लगाकर हमला सहित कई गंभीर मामले दर्ज थे। ऐसे में उसकी मौत पुलिस के लिए उपलब्धि मानी जा सकती है। परंतु यह घटनाक्रम इतना सीधा नहीं रहा। प्रश्न उठ रहे हैं कि आखिर ऐसी क्या परिस्थिति थी कि माडवी हिड़मा जैसे दुर्दांत नक्सली के आत्मसमर्पण की जगह एनकाउन्टर का रास्ता चुना गया। पकड़कर जिंदा रखते तो निश्चित ही बहुत सारी जानकारियां हासिल कर सकते थे। लेकिन वाहवाही लूटने के चक्‍कर में एक मौका गवां दिया है।

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    हिड़मा के आत्मसमर्पण से लाभ और मिलते जबाव:

    ● देश भर में लाल आतंक का नेटवर्क एक झटके में टूट जाता।
    ● पैसों और हथियारों से नक्सल नेटवर्क की कौन मदद करता था।
    ● पिछले 25 सालों में माडवी हिड़मा उर्फ देवा द्वारा मारे गए 150 से ऊपर फोर्सेस के लोगों के पीछे असली व्यक्ति कौन था?
    ●  झीरम घाटी का असली मास्टर माइंड कौन है?
    ● भारत में नक्सलवाद को चलाने वाले असली किरदार कौन है?
    ● क्या गृहमंत्री विजय शर्मा ने सिर्फ आलाकमान के सामने अपने नंबर बढ़ाने के लिए एनकाउन्टर करवाया या इसके पीछे कोई साजिश थी?
    ● क्या हिडिमा के आत्मसमर्पण करने से बस्तर के आदिवासी हमेशा के लिये लाल आतंक से रास्ते से दूर चले जाते?

    एनकाउंटर पर उठते सवाल: 

    ● यदि गिरफ्तारी संभव थी तो उसे जिंदा पकड़ने का विकल्प क्यों नहीं अपनाया गया?
    ● गोली कमर के ऊपर वाले हिस्से में क्यों दागी गई, चर्चा का विषय बना हुआ है।
    ● आमतौर पर आत्मसमर्पण की स्थिति में पुलिस घातक हिस्सों पर गोली नहीं चलाती, बल्कि ऐसी जगह फायरिंग करती है जहाँ जान बच सकती है।
    ● हिडिमा को जिस स्थान पर गोली लगी, उसने परिस्थितियों को और संदिग्ध बना दिया।

    आंध्रप्रदेश पुलिस की कार्रवाई पर संदेह: 

    चर्चा है कि आंध्र पुलिस ने इंटेलिजेंस इनपुट्स के आधार पर पिछले कुछ दिनों में ताबड़तोड़ रेड्स चलाईं। इन रेड्स में कृष्णा, एलुरु, काकीनाडा, एनटीआर विजयवाड़ा और कोनसीमा जिलों में छिपे माओवादियों को ढूंढ-ढूंढकर पकड़ा गया। कुल 50 माओवादी कैडर गिरफ्तार किए गए, जो अपने आप में बेहद बड़ा ऑपरेशन माना जा रहा है।

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    समर्पण का विकल्प कितना मजबूत था ?

    चर्चा यह भी है कि माडवी हिड़मा बीते कुछ महीनों से आत्मसमर्पण के बारे में बातचीत कर रहा था या सुराग तलाशने वाली एजेंसियों के संपर्क में था। इस तथ्य की आधिकारिक पुष्टि न तो पुलिस ने की और न ही राज्य के गृह मंत्रालय ने। लेकिन नक्सल विरोधी अभियानों से जुड़े लोगों के हवाले से यह दावा सामने आया कि उसके आत्मसमर्पण की संभावना तेजी से बढ़ रही थी। यही बिंदु आलोचना का केंद्र है। यदि हिडमा जीवित पकड़ा जाता तो नक्सली नेटवर्क के बड़े हिस्से की जानकारी उजागर हो सकती थी। हथियार सप्लाय चेन, प्रशिक्षण तंत्र, वित्तीय नेटवर्क, स्थानीय समर्थन और माओवादी नेतृत्व की गतिविधियों का अंदरूनी डेटा मिल सकता था। इसी कारण आलोचना के स्वर बुलंद हुए कि कहीं उद्देश्यपूर्ण ढंग से उसे जिंदा न रखने का निर्णय तो नहीं लिया गया?

    राजनीतिक बयानबाजी और आरोपों की श्रृंखला

    एनकाउंटर पर सवाल उठाने वाले प्रमुख नेताओं में पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह सबसे आगे रहे। उन्होंने पूछा कि अगर हिड़मा को घेरा गया था तो उसे आत्मसमर्पण का अवसर क्यों नहीं दिया गया? उनका तर्क है कि सूचना देने, नेटवर्क उजागर करने और नक्सल संगठन की रणनीतियों का पर्दाफाश करने वाले डेटा तक पहुंचने का अवसर मुख्यमंत्री और केंद्रीय एजेंसियों ने खो दिया। विपक्ष दावा कर रहा है कि यह एनकाउंटर नक्सल विरोधी नीति की रणनीति से ज्यादा राजनीतिक लाभ का साधन बन गया।

    हिड़मा की मौत को सहजता से नहीं ले रहे बस्तर के आदिवासी

    वर्षों से बस्तर के भोले भाले आदिवासियों को जल-जंगल-जमीन के नाम से बरगला के नक्सली अपने आतंक के रास्ते पर ले ज़ाते रहे है। सालों से शोषण झेल रहे आदिवासियों को मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की नीतियों के कारण भरोसे में आकर अब बस्तर के विकास पर लग गए हैं। इनके नेतृत्व में 4000 से ज्यादा नक्सली आत्मसमर्पण कर चुके हैं।  हिड़मा जैसे दुर्दांत नक्सली जो लोकल आदिवासियों से लाल आतंक का पोस्टर बॉय बना उसके आत्मसमर्पण करने से एक झटके में बस्तर से लाल आतंकवाद जड़ से खत्म हो जाता। साथ ही झीरम घाटी समेत फोर्सेस के 150 लोगों की हत्याओं के असली मास्टरमाइंड बेनकाब हो ज़ाते। इसके अलावा देश के दुश्मनों का भी खुलासा होता जो इनको पैसों एवं हथियारों से मदद करते थे। अब आखिर गृहमंत्री विजय शर्मा से सवालों का उत्तर बीजेपी आलाकमान द्वारा लिया जाना चाहिए।

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    *विजया पाठक की रिपोर्ट*

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    Editor in Chief

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