* परिजनों ने बताया—छात्रावास में रहने के बाद से दिखते हैं “काले साए”;
* विशेषज्ञ बोले—मानसिक भय, तनाव और स्वास्थ्य कारणों की हो सकती है वजह
* मॉनिटरिंग पर उठे सवाल
छत्तीसगढ़
कोरबा-पोडी उपरोड़ा/स्वराज टुडे: जिले के पोडी उपरोड़ा स्थित कस्तूरबा गांधी कन्या छात्रावास (टाइप-4) इन दिनों अजीबोगरीब घटनाओं को लेकर सुर्खियों में है। छात्रावास में रह रही बालिकाओं के बीच “भूत-प्रेत” का डर इस कदर हावी हो गया है कि कई छात्राएं वहां रहने से इंकार कर रही हैं। हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि हाल ही में परीक्षा देने वाली कई बालिकाओं ने छात्रावास छोड़कर आसपास किराए के कमरों में या फिर अपने रिश्तेदारों के यहां रहकर परीक्षा दी।
मामले ने तब और गंभीर रूप ले लिया जब बुधवार को एक बालिका ने डर के कारण अपने घर में जहर खाकर आत्महत्या का प्रयास किया। उसे तत्काल पोडी उपरोड़ा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया, जहां उपचार के बाद उसकी हालत अब खतरे से बाहर बताई जा रही है। हालांकि, बालिका अब भी छात्रावास लौटने को तैयार नहीं है और उसके मन में गहरा भय बना हुआ है।
परिजनों का दावा—“काले साए दिखते हैं”
घटना के बाद बालिका के परिजनों ने बताया कि जब से वह छात्रावास में रह रही है, तब से वह असामान्य व्यवहार कर रही थी। उनके अनुसार, बच्ची बार-बार यह कहती थी कि उसे दो प्रकार के “काले साए” दिखाई देते हैं, जिससे वह काफी डरी और मानसिक रूप से परेशान रहती थी। परिजनों ने आशंका जताई है कि बच्ची के स्वास्थ्य की गंभीरता से जांच कराई जानी चाहिए, ताकि वास्तविक कारण सामने आ सके।
अधिकारियों की अनभिज्ञता ने बढ़ाई चिंता
जब इस पूरे मामले में खंड शिक्षा अधिकारी आर. दयाल से जानकारी ली गई, तो उन्होंने इस विषय में किसी भी जानकारी से इनकार कर दिया। वहीं जिला शिक्षा अधिकारी ने भी मामले से अनभिज्ञता जाहिर की। अधिकारियों के इस रवैये से यह स्पष्ट होता है कि छात्रावासों की मॉनिटरिंग में गंभीर लापरवाही बरती जा रही है।
डर, अंधविश्वास या स्वास्थ्य समस्या ?क्या है विशेषज्ञों की राय
जानकारों और विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की घटनाएं कई कारणों से हो सकती हैं, जिन्हें गंभीरता से समझना जरूरी है—
● मानसिक भय और सामूहिक प्रभाव: एक बच्चे के मन में बैठा डर तेजी से अन्य बच्चों में भी फैल सकता है, जिससे सामूहिक डर का माहौल बन जाता है।
● तनाव और अकेलापन: घर से दूर रहने, पढ़ाई का दबाव और असुरक्षा की भावना बच्चों में मानसिक तनाव बढ़ा सकती है।
● स्वास्थ्य संबंधी कारण: शरीर में विटामिन की कमी, विशेषकर आयरन की कमी (एनीमिया), नींद की कमी या कमजोरी के कारण भ्रम जैसी स्थिति बन सकती है।
● अफवाह और अंधविश्वास: जागरूकता की कमी और आसपास की मान्यताएं बच्चों के मन में काल्पनिक डर को वास्तविक रूप दे सकती हैं।
विशेषज्ञों का साफ कहना है कि ऐसे मामलों में “भूत-प्रेत” जैसी बातों से ज्यादा जरूरी है कि बच्चों की मेडिकल जांच, मानसिक काउंसलिंग और उचित देखभाल की जाए।
आदिवासी क्षेत्र में बढ़ती चुनौती
कोरबा जिला आदिवासी बहुल क्षेत्र है, जहां ग्रामीण इलाकों में आज भी भूत-प्रेत और झाड़-फूंक जैसी मान्यताएं प्रचलित हैं। ऐसे में छात्रावास जैसे शैक्षणिक संस्थानों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वे बच्चों को वैज्ञानिक सोच की ओर प्रेरित करें और अंधविश्वास से दूर रखें।
शिक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल
यह घटना शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। जहां स्कूलों और छात्रावासों का उद्देश्य बच्चों के मन से अंधविश्वास दूर करना होता है, वहीं यहां स्थिति उलट नजर आ रही है। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है और वे मानसिक भय के कारण शिक्षा से दूर हो रहे हैं।
प्रशासन से मांग—हो सख्त कार्रवाई
स्थानीय लोगों और अभिभावकों ने प्रशासन से मांग की है कि छात्रावास में तत्काल काउंसलिंग और मेडिकल जांच की व्यवस्था की जाए। संबंधित अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच हो । छात्रावासों की नियमित मॉनिटरिंग सुनिश्चित की जाए। बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दिया जाए । अब बड़ा सवाल यह है कि क्या शासन-प्रशासन इस गंभीर मामले को संज्ञान में लेकर ठोस कार्रवाई करेगा और छात्राओं को सुरक्षित व भयमुक्त वातावरण उपलब्ध करा पाएगा?

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