नई दिल्ली/स्वराज टुडे: बड़ी पुरानी कहावत है कि हारने वालों का अपना रुतबा होता है मलाल तो वो करें जो रेस में दौड़े ही नहीं. इस एशियन गेम्स में भी कुछ ऐसे खिलाड़ी भारतीय दल में गए जो हारने के डर से मैदान पर उतरे ही नहीं.
खेल में किसी एथलीट के हारने में कोई समस्या नहीं है. खेल में हमेशा कोई जीतेगा और कोई हारेगा. एक खिलाड़ी जितनी बार जीतता है, उससे कहीं ज्यादा बार हारता है. खेल का यही नियम है और इसी वजह से खेल को खेल कहा जाता है.
नागोया में कुछ एथलीटों का पहुंचना और फिर प्रतियोगिता में हिस्सा ही नहीं लेना गंभीर सवाल खड़े करता है. समस्या हारने की नहीं है, समस्या मैदान पर उतरकर मुकाबला ही नहीं करने की है. प्रवीण चित्रवेल नागोया क्यों आए? उन्हें भेजने का फैसला किस आधार पर हुआ? वह प्रतियोगिता में हिस्सा क्यों नहीं ले सके? ज्योति याराजी को लेकर क्या स्थिति थी? क्या वह वास्तव में प्रतिस्पर्धा करने की स्थिति में थीं? इन सवालों के जवाब मिलने चाहिए
चित्रवेल ने दिया देश को चकमा
प्रवीण चित्रवेल का मामला इसका बड़ा उदाहरण है. उन्हें पदक का पक्का दावेदार माना जा रहा था. उनका रिकॉर्ड भी इस उम्मीद को सही ठहराता था. एथलीट्स के परिचय के दौरान वह मौजूद थे, उन्होंने दर्शकों का अभिवादन भी किया. लेकिन जब मुकाबले की बारी आई तो उनके नाम के आगे एनएम यानी ‘नो मार्क’ दर्ज हो गया. वह एक भी वैध प्रयास नहीं कर सके और चोट के कारण प्रतियोगिता से बाहर हो गए.
ज्योति क्यों गई जापान?
यही सवाल ज्योति याराजी को लेकर भी उठता है. पिछले कई हफ्तों से लगातार सुनने को मिल रहा था कि ज्योति चोटिल हैं. ऐसे में सवाल है कि वह नागोया आईं ही क्यों? क्या उन्हें यहां लाना फैसला लेने में हुई चूक थी? क्या पहले से पता था कि चोट फिर उभर सकती है? या फिर वही जुगाड़ वाली सोच थी कि ‘चलो जी, हो जाएगा’? अगर खिलाड़ी प्रतिस्पर्धा करने की स्थिति में ही नहीं थी तो उसे यहां लाने का फैसला क्यों किया गया? इसके अलावा पालाक्षा जैसे कुछ एथलीट भी हैं, जिन्होंने प्रतियोगिता में हिस्सा तक नहीं लिया. और यही सबसे बड़ी परेशानी है. हार कोई समस्या नहीं है. पूरी कोशिश के बाद अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन नहीं कर पाना भी समस्या नहीं है. लेकिन मैदान पर उतरने की स्थिति में ही नहीं होना और फिर भी टीम का हिस्सा बनकर यहां पहुंचना सवाल जरूर खड़ा करता है.
कौन है इसका जिम्मेदार?
सबसे पहली जिम्मेदारी एथलीट की है. हर खिलाड़ी वयस्क है और अपने शरीर को सबसे बेहतर तरीके से समझता है. उसे पता होना चाहिए कि वह खेलने की स्थिति में है या नहीं. दूसरी जिम्मेदारी कोच की है. कोच खिलाड़ी को किसी भी दूसरे व्यक्ति से बेहतर जानता है और उसकी जिम्मेदारी है कि वह फेडरेशन को सही सलाह दे. अगर फेडरेशन किसी खिलाड़ी को एकतरफा फैसला लेकर टीम से बाहर करता है तो भारत में अक्सर कहानी का दूसरा पहलू सामने आता है. खिलाड़ी खुद को पीड़ित बताता है और उसे आसानी से सहानुभूति मिल जाती है, जबकि फेडरेशन खलनायक बन जाता है.लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि फेडरेशन अपनी जिम्मेदारी से बच सकता है. उसे भी जवाबदेह होना होगा. मजबूत फैसले लेने होंगे और जरूरत पड़ने पर जांच भी करानी होगी.
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