छत्तीसगढ़
कोरबा/स्वराज टुडे: पूरे प्रदेश में बड़े हर्षोल्लास के साथ भोजली पर्व मनाने की तैयारी को लेकर छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना द्वारा आज प्रेस क्लब तिलक भवन में प्रेसवार्ता आयोजित की गई । छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना के प्रदेश संयोजक दिलीप मिरी ने पत्रकारों से मुखातिब होते हुए कहा कि आप सभी के बीच बैठकर कोई औपचारिक भाषण देने नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी, अपनी जड़ों और अपने पुरखों की उस धरोहर के बारे में बात करने आया हूँ, जिसमें हम सबका अस्तित्व जुड़ा हुआ है।
हम सभी जानते हैं कि कोरबा सिर्फ कोयला, चिमनी और बिजली की नगरी नहीं है, बल्कि कोरबा की असली धड़कन हमारी छत्तीसगढ़ी संस्कृति, परंपरा और लोकजीवन में बसती है।
माटी का श्रृंगार और मीत-मितानी की अमर रीत — हमारी भोजली।
भोजली सिर्फ एक रस्म नहीं है और न ही टोकरी में उगे जौ का हरा पौधा मात्र है। भोजली तो प्रकृति के प्रति हमारी कृतज्ञता, आस्था और वंदना की पावन परंपरा है। आसमान से गिरने वाली पानी की हर बूंद को हमारे पुरखों ने गंगा मैया का स्वरूप माना। टोकरी में भीगी हुई मिट्टी रखकर पुरी आस्था के साथ जौ बोया जाता है।
यह हरी-भरी भोजली हमारी धरती माता का श्रृंगार है, वही धरती माता जो हमें अन्न देती है और जीवन देती है।
यह पर्व हमें याद दिलाता है कि प्रकृति का हम पर कितना बड़ा उपकार है और हम प्रकृति के कितने ऋणी हैं।
और हमारी इस संस्कृति में मितान परंपरा का अटूट बंधन भी जुड़ा हुआ है।
आज जब समाज का हर वर्ग रिश्तों का अर्थ खोज रहा है, तब हमारी छत्तीसगढ़िया संस्कृति भोजली के एक तिनके से मितान का रिश्ता जोड़ देती है। कान के पीछे भोजली खोंसकर जब दो लोग एक-दूसरे से हाथ मिलाते हैं, तो वह रिश्ता केवल आज तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जिंदगी भर के सुख-दुख का साथी बन जाता है। यहाँ न कोई जाति का भेद है, न कोई ऊँच-नीच। यहाँ केवल मया, अपनापन और भाईचारा है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हमारे बच्चे मोबाइल की स्क्रीन में उलझते जा रहे हैं।
अगर हम अपने बच्चों को भोजली, करमा, सुआ, पंथी और अपनी लोकपरंपराओं के बारे में नहीं बताएँगे, तो हमारी यह पहचान धीरे-धीरे धुंधली हो जाएगी।
इसी सांस्कृतिक ज्योति को कोरबा सहित पूरे छत्तीसगढ़ में फिर से जगमगाने का यह हमारा एक छोटा-सा प्रयास है।
प्रदेश स्तरीय भोजली रैली
यह आयोजन सिर्फ कोरबा का आयोजन नहीं है, बल्कि यह एक भव्य प्रदेश स्तरीय सांस्कृतिक समागम बनने जा रहा है।
छत्तीसगढ़ के कोने-कोने से लोक कलाकार अपनी मिट्टी की खुशबू, अपनी कला और अपनी संस्कृति को लेकर हमारे बीच पहुँच रहे हैं।
रैली में अलग-अलग अंचलों के पारंपरिक लोकनृत्य, लोकसंगीत और हमारी पुरखौती धरोहर को दर्शाती झाँकियाँ आकर्षण का केंद्र रहेंगी।
एक ही मंच पर पूरे छत्तीसगढ़ की बहुरंगी लोकसंस्कृति का यह जीवंत दर्शन हमारे जिले और पूरे प्रदेशवासियों के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव होगा।
भोजली महोत्सव 29 अगस्त — घंटाघर, कोरबा
इसी मिट्टी के गौरव को एक नया विस्तार देने के लिए आगामी 29 अगस्त को कोरबा के घंटाघर चौक में भव्य भोजली रैली निकाली जा रही है।
हमारी दाई-बहनें पारंपरिक वेशभूषा में, सिर पर भोजली का कलश रखकर रैली में शामिल होंगी।
मांदर की थाप होगी, झांझ-मंजीरे की झंकार होगी और पूरा घंटाघर चौक लोकगीतों की मिठास से गूंज उठेगा।
विसर्जन के बाद हम एक-दूसरे को भोजली भेंट करके भाईचारे, मया-दुलार और सामाजिक सौहार्द के संकल्प को फिर दोहराएँगे।
शहरवासियों से शामिल होने की अपील
यह आयोजन किसी एक संस्था का नहीं है। यह पूरे कोरबा और पूरे छत्तीसगढ़ का आयोजन है। आइए, 29 अगस्त को घंटाघर में हम सभी मिल-जुलकर अपनी लोकसंस्कृति के इस महायज्ञ को सफल बनाएँ। अपनी मिट्टी, अपनी संस्कृति और अपनी परंपरा के मान-सम्मान के लिए हम सभी एकजुट होंए।

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