कबीरपंथी में गुरू का स्थान सबसे ऊपर है. छत्तीसगढ़ की उर्जाधानी में इस परंपरा का निर्वाह करते हुए कबीर जयंती मनाई गई. इसे कबीर का प्रकट उत्सव भी कहा जाता है.
कोरबा में कबीर जयंती
छत्तीसगढ़
कोरबा/स्वराज टुडे: छत्तीसगढ़ सहित देश भर में संत कबीर की आज हर्षोल्लास से जयंती मनाई गई. छत्तीसगढ़ में पनिका समाज को कबीरपंथी कहा जाता है. कबीर पंथ को मानने वाले पूरे छत्तीसगढ़ में बड़ी तादाद में हैं.
कबीरपंथी मानते हैं कि कबीर इस धरती पर प्रकट हुए थे और एक प्रकाश की तरह इस संसार को रोशन किया. कबीर जयंती का उत्सव कबीरपंथी एक हफ्ते तक मनाते हैं मुख्य कार्यक्रम प्रसिद्ध तीर्थ स्थल कुदुरमाल में आयोजित किया गया. कबीरपंथ के अनुयायियों ने बाजे गाजे के साथ भव्य कलश यात्रा निकाली, इसके उपरांत चौका आरती और सात्विक यज्ञ करके कबीर जयंती मनाई. शाम को भंडारे का आयोजन किया गया.

ग्राम कुदुरमाल जिला मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर दूर है. इसके संबंध में ऐसा माना जाता है कि यह कबीर पंथ के सदगुरु की समाधि स्थल है. इसका निर्माण 16वीं से 17वीं शताब्दी के मध्य हुआ था. छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से इसे राज्य संरक्षित स्मारक का दर्जा भी दिया गया है. कुदुरमाल में छत्तीसगढ़ शाखा के धर्मदास साहेब और वंशगद्दी के नाम से कबीर पंथ की एक महत्वपूर्ण शाखा है. ऐसी मान्यता है कि इस शाखा के संस्थापक मुक्तामणि नाम साहेब थे, जो संत कबीर के शिष्य थे. यहां कबीर आश्रम भी बनाया गया है.

कुदुरमाल में कबीर पंथियों के धर्म गुरु ने बताया कि आज का दिन सभी कबीरपंथी भाइयों के लिए बेहद खास होता है. संत कबीर हमारे आराध्य हैं. वह हमारे जगतगुरु हैं. आज भी हम उनके दिखाए हुए मार्ग पर चलते हैं. आज हम विधि विधान से चौका आरती के बाद सात्विक यज्ञ का आयोजन करते हैं. संत कबीर ने हमें निराकार ईश्वर के उपासना का संदेश दिया था. कबीर पंथ में गुरु का स्थान सबसे ऊपर होता है. हम गुरु को ही अपना भगवान मानते हैं. संत कबीर ने भी यही संदेश दिया था कि जगत में राम और कृष्णा से बड़ा कोई नहीं है, लेकिन उन्होंने भी अपने गुरु को नमन किया. इसलिए हम मानते हैं कि गुरु हमारे लिए सबसे ऊपर हैं. कबीर के अनेक दोहे हमें आज भी सांसारिक मोह माया से बाहर निकलने का संदेश देते हैं. मनुष्य इस संसार के मोह माया में फंसा हुआ था और उसे बाहर निकालने के लिए ही संत कबीर एक प्रकाश की तरह इस धरती पर प्रकट हुए थे.”

जगतगुरु स्वामी रामानंदाचार्य के 12 शिष्यों में से संत कबीर एक थे. कबीर इन सभी में से अलग थे, जिन्होंने गुरु से दीक्षा ली और अपना अलग रास्ता तैयार किया. इसके बाद वह सभी संतो के शिरोमणि के रूप में प्रख्यात हुए. कबीर ने धार्मिक आडंबर पर सीधा प्रहार किया. धर्म की आड़ में होने वाले पाखंड को उजागर किया और लोगों में जागरूकता फैलाई. तब के हिंदू राजा और मुस्लिम धर्मगुरुओं की संत कबीर ने तीखी आलोचना की. कबीर को तब वह पसंद नहीं करते थे. वह जगतगुरु रामानंद के शिष्य थे, इसलिए लोग उनपर सीधा हमला करने से डरते भी थे.
संत कबीर ने निराकार ईश्वर की उपासना का संदेश दिया. वह इस बात के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाते थे कि संत जो कहते हैं, अनुयाई उसे ठीक तरह से समझ नहीं पाते. उसे दूसरे अर्थों में ले लेते हैं. उन्होंने निर्गुण और निराकार ईश्वर के उपासना की बात कही. अपना एक मार्ग बनाया, लेकिन बाद में उनके अनुयायियों ने इसका पंथ बना दिया और अब कबीर को मानने वाले उनकी आराधना करने वाले को कबीरपंथी कहा जाता है.






