*स्लॉटर हाउस से मध्यप्रदेश में उबाल, सवालों के घेरे में सत्ता–संगठन
*क्या गौ मांस के पैसों से अपनी राजनीति चमका रही हैं भोपाल महापौर मालती राय और उनके राजनीतिक आका?
*मालती राय ने आखिर किस मजबूरी के तहत असलम चमड़े को नियमों में शिथिल कर दिलवाया काम
*स्लॉटर हाउस में कथित गौ-हत्या आस्था पर चोट, प्रशासनिक चूक या महापौर की असंवेदनशीलता?
*आस्था, कानून और जवाबदेही के चौराहे पर खड़े मंत्री विश्वास सारंग
भोपाल/स्वराज टुडे: भोपाल में अभी हाल में हुई एक शर्मनाक घटना ने भाजपा के धार्मिक नैरेटिव वाली राजनीति को बदल कर रख दिया है। दरअसल भोपाल की महापौर मालती राय ने अक्टूबर 2025 में असलम चमड़े नाम के कसाई की कंपनी को सारे नियम ताक पर रखवाकर अत्याधुनिक स्लॉटर हाउस की चाबी दे दी। गौर करने वाली बात यह है कि मालती राय की पूरी राजनीति उनके राजनीतिक आका मंत्री विश्वास सारंग के आसपास घूमती है। पावर गैलेरी में तो सारंग को शैडो मेयर भी कहा जाता है, तो बड़ा सवाल यह है कि क्या गौ मांस के पैसो से ही नरेला विधानसभा में धार्मिक आयोजन हो रहे हैं। जहां मोदी-शाह समेत पूरी बीजेपी देश में “जी राम जी” को लेकर मुद्दा बना रही है ठीक उसी समय भोपाल राजधानी में एक गौ तस्कर ने भोपाल महापौर में संरक्षण में 250 गायें कटवा दी। यह मामला तो पकड़ में आ गया पता नहीं कितनी हजारों गायों का वध अभी तक इन लोगों ने करवा चुके हैं।
कटघरे में सत्ता, संगठन और प्रशासन
बड़ा सवाल यह है कि विश्वास सारंग और उनके खास लोगों के नाम भोपाल के असामाजिक तत्व चाहे सट्टा किंग मस्तान, क्रिमिनल जुबेर, ड्रग्स एवं क्रिमिनल मछली परिवार या गौ तस्कर असलम चमड़ा के साथ क्यों जुड़ते हैं और वो उनके रहनुमा निकलते हैं। सबसे बेशर्मी की बात है कि बीजेपी जो इन सब मुद्दे पर राजनीति करती है वो अपने मंत्री विश्वास सारंग और मालती राय के कुकर्मो पर चुप क्यों है। आधुनिक स्लॉटर हाउस में कथित रूप से प्रतिबंधित पशुओं के मांस कटने के मामले ने सत्ता, संगठन और प्रशासन तीनों को कठघरे में खड़ा कर दिया है। हालात ऐसे बन गए हैं कि सड़क से लेकर मंत्रालय और नगर निगम परिषद के दफ्तरों तक अफरा-तफरी का माहौल है।
गौ-हत्या आस्था, कानून और संवेदनशीलता का सवाल
स्लॉटर हाउस से जुड़ा कथित गौ-हत्या का मामला केवल एक प्रशासनिक या कानूनी विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रदेश की सामाजिक, धार्मिक और नैतिक संवेदनाओं से सीधे तौर पर जुड़ गया है। गाय को भारतीय संस्कृति में माता का दर्जा प्राप्त है और मध्यप्रदेश में गौ-संरक्षण से जुड़े कानून भी बेहद सख्त हैं। ऐसे में स्लॉटर हाउस परिसर में प्रतिबंधित पशु के मांस से जुड़े आरोपों ने जनभावनाओं को आहत किया है। इस मामले ने प्रशासनिक व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यदि आरोप सही हैं, तो यह न केवल कानून की अनदेखी है, बल्कि निगरानी तंत्र की विफलता भी दर्शाता है। वहीं, यह भी आवश्यक है कि किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच पूरी हो, ताकि सच्चाई सामने आ सके और निर्दोष को अनावश्यक रूप से कटघरे में न खड़ा किया जाए। इस प्रकरण ने एक बार फिर यह रेखांकित किया है कि आस्था से जुड़े मामलों में प्रशासन की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। जनता की अपेक्षा है कि सरकार भावनाओं का सम्मान करते हुए कानून के अनुसार कठोर और निष्पक्ष कार्रवाई करे, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो और समाज में विश्वास बना रहे। वैसे उत्तराखंड में गाय को मिथुन भी कहा जाता है।
स्लॉटर हाउस संचालक पर उठे सवाल
आधुनिक स्लॉटर हाउस के संचालक असलम कुरैशी को लेकर कई सवाल खड़े किए जा रहे हैं। आरोप लगाए जा रहे हैं कि उन्हें प्रभावशाली संरक्षण प्राप्त था, जिसके चलते नियमों की अनदेखी संभव हो सकी। हालांकि संबंधित पक्षों की ओर से इन आरोपों को सिरे से खारिज किया गया है और कहा गया है कि बिना जांच पूरी हुए किसी निष्कर्ष पर पहुँचना अनुचित होगा।
महापौर की भूमिका पर बहस
भोपाल की महापौर मालती राय द्वारा स्लॉटर हाउस के संचालन को लेकर लिए गए निर्णयों पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोपों में कहा जा रहा है कि नगर निगम परिषद की औपचारिक स्वीकृति के बिना संचालन की जिम्मेदारी सौंपी गई।
सवालों के घेरे में मंत्री, जवाबदेही से दूरी क्यों?
मध्यप्रदेश की राजनीति में मंत्री विश्वास सारंग का नाम एक बार फिर विपक्ष के तीखे निशाने पर है। विपक्ष का आरोप है कि सत्ता के संरक्षण में चल रहे कथित अनियमित तंत्र पर मंत्री की चुप्पी संदेह को और गहरा करती है। जब प्रदेश में आस्था, कानून और प्रशासन से जुड़े संवेदनशील मामले सामने आते हैं, तब जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति से सबसे पहले स्पष्टता और जवाबदेही की अपेक्षा की जाती है, न कि बचाव की राजनीति। विपक्ष का कहना है कि जिन मामलों में नैतिकता और कानून की सीधी परीक्षा होती है, वहां मंत्री का रुख अस्पष्ट रहा है। सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि क्या राजनीतिक प्रभाव के कारण जांच की गति और दिशा प्रभावित हो रही है। यदि सब कुछ नियमों के तहत है, तो स्वतंत्र और समयबद्ध जांच से डर कैसा?
सारंग का नाम यासीन मछली के संरक्षक होने पर उठा था
इस विवाद के साथ-साथ यासीन मछली से जुड़े ड्रग्स प्रकरण का भी जिक्र फिर से होने लगा है, जिसमें पहले भी मंत्री विश्वास सारंग की भूमिका को लेकर सवाल उठे थे। हालांकि उस समय भी कोई ठोस निष्कर्ष सामने नहीं आया था। अब एक बार फिर पुराने मामलों को जोड़कर राजनीतिक दबाव बनाया जा रहा है।
मुख्यमंत्री के सामने बड़ा सवाल
इन तमाम आरोपों और दावों के बीच सबसे बड़ा सवाल मुख्यमंत्री मोहन यादव के सामने खड़ा है। क्या वे इस मामले में निष्पक्ष और पारदर्शी जांच के आदेश देंगे या फिर राजनीतिक सहयोगियों पर लगे आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए क्लीनचिट दी जाएगी? जनता और संगठन दोनों की निगाहें अब मुख्यमंत्री के अगले कदम पर टिकी हैं।
विजया पाठक की रिपोर्ट
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