* अनुच्छेद 275(1) के केंद्रीय मद में आकांक्षी जिला कोरबा में जमकर बंदरबांट
* ठेकेदारों और अफसरों की मिलीभगत से 2 करोड़ 90 लाख का बंटाधार
कोरबा/कटघोरा: आकांक्षी जिला कोरबा में आदिवासी विकास विभाग की माया का जादू ऐसा चला कि संविधान के अनुच्छेद 275(1) के केंद्रीय मद में स्वीकृत आश्रम और छात्रावासों के निर्माण व नवीनीकरण कार्य जमकर लूटखसोट की भेंट चढ़ गए। कार्यालय से निविदा अभिलेख, कार्यादेश, प्राक्कलन, माप पुस्तिका, देयक व्हाउचर जैसे मूल दस्तावेज रहस्यमय तरीके से गायब हो गए और दूसरी तरफ ठेकेदारों को करोड़ों का भुगतान कर दिया गया। जांच में खुलासा हुआ कि करीब 80 लाख रुपए के कार्य अधूरे या कागजों पर ही दर्ज हैं।
जिला पंचायत सीईओ की अध्यक्षता में गठित जांच समिति ने इस महाघोटाले का भंडाफोड़ करते हुए चार ठेकेदारों और तत्कालीन डाटा एंट्री ऑपरेटर कुश कुमार देवांगन के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है। वहीं तत्कालीन सहायक आयुक्त माया वारियर, एसडीओ अजीत कुमार तिग्गा और उप अभियंता राकेश वर्मा को भी मुख्य रूप से जिम्मेदार माना गया है, जिनके विरुद्ध विभागीय जांच संस्थित करने की अनुशंसा कर दी गई है।
कैसे हुई गड़बड़ी
वित्तीय वर्ष 2021-22 में अनुच्छेद 275(1) के मद से आश्रम-छात्रावासों के लिए 34 कार्य स्वीकृत किए गए थे, जिनकी कुल राशि 3 करोड़ 83 लाख 28 हजार रुपए थी। इन कार्यों का ठेका चार फर्मों को दिया गया।
1) श्री साईं ट्रेडर्स पॉलीवाल बुक डिपो, आईटीआई चौक, रामपुर कोरबा
2) श्री साईं कृपा बिल्डर्स मंगल भवन, छुरी
3) एम.एस. कंस्ट्रक्शन, मेन रोड चैतमा, साजाबहरी
4) बालाजी इन्फ्रास्ट्रक्चर, वार्ड नंबर 6, राजीव नगर, कटघोरा

इन फर्मों को कुल 2 करोड़ 90 लाख 95 हजार 904 रुपए का भुगतान कर भी दिया गया। लेकिन जांच में पाया गया कि कार्य आदेश के 48 लाख रुपए के काम तो शुरू ही नहीं हुए, जबकि तकनीकी जांच में लगभग 80 लाख रुपए के काम धरातल पर नहीं पाए गए।
विभागीय मिलीभगत का खुलासा
गड़बड़ी की पोल खोलने वाली जांच रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत के बिना इतना बड़ा खेल संभव ही नहीं था। निर्माण और भुगतान से जुड़े सभी मूल दस्तावेज विभागीय कार्यालय से ही गायब कर दिए गए। इससे यह संदेह और गहरा हो गया है कि पूरा मामला योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया।
माया वारियर की मुश्किलें बढ़ीं
इस घोटाले में तत्कालीन सहायक आयुक्त माया वारियर की संलिप्तता सामने आने से विभाग में हड़कंप मच गया है। गौरतलब है कि माया वारियर डीएमएफ के स्वीकृत कार्यों की निविदा प्रक्रिया में गड़बड़ी के मामले में पहले से ही जेल में हैं। अब इस नए घोटाले ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।
ठेकेदारों पर एफआईआर
फर्जीवाड़ा करने वाले ठेकेदारों – श्री साईं ट्रेडर्स, श्री साईं कृपा बिल्डर्स, एम.एस. कंस्ट्रक्शन और बालाजी इन्फ्रास्ट्रक्चर – के साथ ही विभागीय डाटा एंट्री ऑपरेटर कुश कुमार देवांगन पर भी आपराधिक प्रकरण दर्ज किया गया है।
जब कार्यों की स्वीकृति, तकनीकी स्वीकृति, भुगतान और सत्यापन सब विभागीय स्तर पर ही होता है, तब करोड़ों का यह खेल बिना उच्च अधिकारियों की शह के बिना कैसे संभव हुआ? यह सिर्फ ठेकेदारों और एक डाटा एंट्री ऑपरेटर का कारनामा नहीं लग रहा, बल्कि पूरे तंत्र की मिलीभगत का जीता-जागता सबूत है।
अब देखना यह है कि यह मामला केवल एफआईआर और विभागीय जांच तक सीमित रह जाता है या फिर वाकई में दोषी अफसर और ठेकेदार जेल की सलाखों के पीछे पहुंचते हैं।
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