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    बूढ़ातालाब’ की पुकार: आदिवासी समाज ने नाम पुनर्स्थापन की मांग को लेकर मुख्यमंत्री को सौंपा ज्ञापन

    Deepak SahuBy Deepak SahuAugust 5, 2025
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    रायपुर में आदिवासी अस्मिता की गूंज: ‘बूढ़ातालाब’ नाम की वापसी के लिए आदिवासी समाज का भावुक आग्रह

    रायपुर/कोरबा(स्वराज टुडे):  राजधानी रायपुर के हृदय में स्थित ऐतिहासिक ‘बूढ़ातालाब’ के नाम को पुनर्स्थापित करने की मांग को लेकर छत्तीसगढ़ का आदिवासी समाज एक बार फिर मुखर हुआ है। आगामी 9 अगस्त – विश्व आदिवासी दिवस के पूर्व, आदिवासी संगठनों ने एक भावनात्मक, तथ्यों से युक्त और सांस्कृतिक चेतना से भरा ज्ञापन राज्य सरकार को सौंपते हुए आग्रह किया है कि इस तालाब का मूल नाम ‘बूढ़ातालाब’ पुनः बहाल किया जाए।

    “सिर्फ एक नाम नहीं, हमारी अस्मिता का प्रतीक है ‘बूढ़ातालाब’”

    आदिवासी समाज की ओर से ‘आदिनिवासी गण परिषद’ के संयोजक बी.एल. नेताम ने मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नाम यह ज्ञापन जिला कलेक्टर, कोरबा के माध्यम से प्रस्तुत किया। ज्ञापन में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह माँग केवल एक नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि आदिवासी आत्मसम्मान, ऐतिहासिक विरासत और सांस्कृतिक अस्मिता की पुनः स्थापना की मांग है।

    श्री नेताम ने कहा कि बूढ़ातालाब कोई साधारण जलाशय नहीं, बल्कि बूढ़ादेव की पौराणिक स्मृति, पूर्वजों की उपस्थिति और आदिवासी जीवन की आध्यात्मिक धुरी है। यह स्थान आदिकाल से समुदाय के सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक क्रियाकलापों का केंद्र रहा है।

    स्वामी विवेकानंद का सम्मान, लेकिन आदिवासी अस्मिता की कीमत पर नहीं

    ज्ञापन में आदिवासी समाज ने स्पष्ट किया कि वे स्वामी विवेकानंद के विचारों और योगदान का सम्मान करते हैं, लेकिन किसी महापुरुष को सम्मानित करने के लिए एक पूरी सभ्यता की पहचान और आत्मा को मिटा देना न तो तर्कसंगत है और न ही न्यायोचित।

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    पूर्ववर्ती सरकार द्वारा वर्ष 2012 में इस तालाब का नाम बदलकर ‘स्वामी विवेकानंद सरोवर’ कर दिया गया था। यह निर्णय न तो समुदाय की सहमति से लिया गया, न ही इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझा गया। यह कदम आदिवासी समाज के लिए एक गहरे आघात जैसा अनुभव था, जिसकी पीड़ा आज भी जीवित है।

    संविधानिक उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक न्याय की मांग

    ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया है कि छत्तीसगढ़ एक आदिवासी बहुल राज्य है, और यहाँ की जनजातीय संस्कृति राज्य की पहचान का आधार है। ऐसे में सरकार का संवैधानिक और नैतिक कर्तव्य बनता है कि वह इस सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करे।

    यह भी कहा गया कि किसी स्थल का नाम केवल शब्द नहीं, बल्कि समाज की स्मृति, इतिहास और पहचान का प्रतीक होता है। बूढ़ातालाब नाम की बहाली, आदिवासी समाज के लिए अपनी जड़ों से पुनः जुड़ने जैसा होगा।

    विश्व आदिवासी दिवस पर ऐतिहासिक निर्णय की अपेक्षा

    ज्ञापन में मुख्यमंत्री से आग्रह किया गया है कि 9 अगस्त, विश्व आदिवासी दिवस के पावन अवसर पर, जब राज्य सरकार स्वयं इस दिन को राजकीय अवकाश घोषित कर आदिवासी गौरव का सम्मान कर चुकी है, तब इस तालाब को उसका मूल नाम ‘बूढ़ातालाब’ लौटाकर एक ऐतिहासिक न्याय करें।

    इस निर्णय से न केवल आदिवासी समाज का आत्म-सम्मान पुनः प्रतिष्ठित होगा, बल्कि यह भी सिद्ध होगा कि राज्य सरकार सचमुच ‘जल-जंगल-जमीन’ के रक्षक समुदाय के साथ खड़ी है।

    सामूहिक भावनाओं की पुकार: यह केवल ज्ञापन नहीं, आत्मा की आवाज़ है

    ‘आदिनिवासी गण परिषद’ द्वारा सौंपे गए इस ज्ञापन की पंक्तियों में केवल शब्द नहीं, बल्कि सदियों पुरानी विरासत की पीड़ा, अस्मिता की छटपटाहट और न्याय की उम्मीद छिपी है। यह याचना नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्निर्माण की चेतावनी भी है – कि कोई भी सरकार यदि समाज के मूल स्तंभों को नजरअंदाज करेगी, तो असंतोष केवल प्रतीकों तक सीमित नहीं रहेगा।

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    अपनी ऐतिहासिक भूल सुधारे सरकार, लौटाए आदिवासी अस्मिता

    छत्तीसगढ़ की राजनीतिक चेतना आज उस मोड़ पर है, जहां केवल योजनाओं और घोषणाओं से नहीं, बल्कि संवेदनशील निर्णयों और सांस्कृतिक न्याय से ही सामाजिक समरसता और असली विकास सुनिश्चित हो सकता है।

    ‘बूढ़ातालाब’ की पुकार केवल रायपुर की गूंज नहीं, यह छत्तीसगढ़ की आत्मा से निकली एक सामूहिक मांग है, जिसे अनसुना करना इतिहास के प्रति अपराध होगा। मुख्यमंत्री के स्तर से यदि इस निर्णय की घोषणा की जाती है, तो यह केवल एक तालाब का नाम नहीं बदलेगा – यह छत्तीसगढ़ की आदिवासी चेतना को उसका गौरव लौटाने का ऐतिहासिक क्षण बन जाएगा।

    Swaraj Today converted
    Deepak Sahu

    Editor in Chief

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