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    सिंगरौली में विकास या विनाश ? अदानी पॉवर प्लांट पर मजदूरों की मौतों ने खड़े किए सवाल

    Deepak SahuBy Deepak SahuMarch 28, 2026Updated:March 28, 2026
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    * सिंगरौली का पॉवर प्लांट: विकास की आड़ में मजदूरों की जान पर खतरा? 

    * अदानी के पॉवर प्लांट में सुरक्षा पर संकट, लगातार मौतों से घिरी व्यवस्था 

    सिंगरौली/स्वराज टुडे: मध्यप्रदेश के सिंगरौली जिले को देश की ऊर्जा राजधानी कहा जाता है। यहां स्थापित बड़े-बड़े ताप विद्युत संयंत्र देश की बिजली जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन विकास की इस चमक के पीछे एक स्याह सच भी लगातार उभर रहा है मजदूरों की सुरक्षा, अधिकार और जीवन की अनदेखी। हाल के घटनाक्रमों ने के पावर प्लांट को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पिछले कुछ समय में सिंगरौली स्थित पावर प्लांट में कई मजदूरों की मौत की घटनाएं सामने आई हैं। स्थानीय स्तर पर यह आरोप लगाए जा रहे हैं कि हर माह औसतन 4 से 5 कर्मचारियों की मौत हो रही है। यदि यह आंकड़े सही हैं, तो यह किसी भी औद्योगिक इकाई के लिए अत्यंत गंभीर और चिंताजनक स्थिति है। मजदूर संगठनों और स्थानीय लोगों का कहना है कि इन घटनाओं के पीछे सुरक्षा मानकों की अनदेखी, उपकरणों की खराब स्थिति और श्रमिकों पर अत्यधिक कार्य दबाव प्रमुख कारण हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर इतनी बड़ी कंपनी होने के बावजूद श्रमिकों की सुरक्षा सुनिश्चित क्यों नहीं की जा रही?

    सुरक्षा बनाम मुनाफा

    औद्योगिक विकास के साथ श्रमिक सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए, लेकिन आरोप है कि यहां मुनाफे को प्राथमिकता दी जा रही है। कार्य स्थल पर पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों की कमी, प्रशिक्षण का अभाव और आपातकालीन प्रबंधन की कमजोर व्यवस्था जैसी समस्याएं बार-बार उजागर हो रही हैं। यदि किसी संयंत्र में लगातार दुर्घटनाएं हो रही हैं, तो यह केवल संयोग नहीं हो सकता। यह एक प्रणालीगत विफलता की ओर संकेत करता है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि कंपनी अपनी कार्यप्रणाली की गंभीर समीक्षा करे और जवाबदेही तय हो।

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    सरकार की भूमिका पर सवाल

    इस पूरे मामले में प्रदेश सरकार की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। के नेतृत्व वाली सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि वह इन घटनाओं पर कठोर कार्रवाई करने के बजाय मौन साधे हुए है। जब किसी क्षेत्र में लगातार श्रमिकों की जान जा रही हो तो सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह निष्पक्ष जांच कराए, दोषियों पर कार्रवाई करे और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए। लेकिन यदि प्रशासनिक उदासीनता बनी रहती है, तो यह स्थिति और गंभीर हो सकती है।

    जमीन आवंटन और पारदर्शिता का सवाल

    अडानी के नेतृत्व वाले समूह को सिंगरौली में हजारों एकड़ जमीन दिए जाने को लेकर भी पहले से ही विवाद रहा है। आरोप है कि यह जमीन बाजार मूल्य से काफी कम कीमत पर दी गई और इसमें पारदर्शिता का अभाव रहा। भूमि अधिग्रहण जैसे संवेदनशील विषय में यदि स्थानीय समुदायों की सहमति और उचित मुआवजा सुनिश्चित नहीं किया जाता, तो असंतोष स्वाभाविक है। यह केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और अधिकारों का प्रश्न भी है।

    स्थानीय समुदाय और विस्थापन

    सिंगरौली क्षेत्र में औद्योगिक परियोजनाओं के चलते बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ है। कई गांवों के लोग अपनी जमीन और आजीविका से वंचित हुए हैं। ऐसे में यदि उन्हें रोजगार और सुरक्षा भी नहीं मिलती, तो यह दोहरी मार साबित होती है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि उन्हें न तो पर्याप्त मुआवजा मिला और न ही स्थायी रोजगार के अवसर। जो लोग प्लांट में काम कर रहे हैं, वे भी असुरक्षित परिस्थितियों में काम करने को मजबूर हैं।

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    श्रम कानूनों का पालन कितना?

    भारत में श्रमिकों की सुरक्षा के लिए कई कानून और नियम बनाए गए हैं। इनमें कार्यस्थल पर सुरक्षा उपकरण, प्रशिक्षण, कार्य घंटों की सीमा और स्वास्थ्य सुविधाएं शामिल हैं। लेकिन यदि इनका पालन केवल कागजों तक सीमित रह जाए, तो उनका कोई अर्थ नहीं रह जाता। जरूरत इस बात की है कि श्रम विभाग नियमित निरीक्षण करे और किसी भी प्रकार की लापरवाही पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करे। साथ ही, मजदूरों को भी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक किया जाए।

    जवाबदेही तय करने की जरूरत

    किसी भी दुर्घटना के बाद केवल मुआवजा देना पर्याप्त नहीं है। असली जरूरत है जवाबदेही तय करने की।
    · क्या सुरक्षा मानकों का पालन किया गया था?
    · क्या कर्मचारियों को पर्याप्त प्रशिक्षण दिया गया था?
    · क्या उपकरण समय-समय पर जांचे गए थे?
    इन सवालों के स्पष्ट जवाब सामने आने चाहिए। यदि कहीं भी लापरवाही पाई जाती है, तो जिम्मेदार अधिकारियों और प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई होना जरूरी है।

    समाधान की दिशा में कदम

    · स्थिति को सुधारने के लिए कुछ ठोस कदम उठाए जाने आवश्यक हैं।
    · स्वतंत्र जांच आयोग का गठन – सभी दुर्घटनाओं की निष्पक्ष जांच हो।
    · सुरक्षा ऑडिट – नियमित अंतराल पर प्लांट का थर्ड पार्टी सुरक्षा ऑडिट कराया जाए।
    · श्रमिक प्रशिक्षण – सभी कर्मचारियों को आधुनिक सुरक्षा प्रशिक्षण दिया जाए।
    · स्वास्थ्य सुविधाएं – कार्यस्थल पर आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था मजबूत की जाए।
    · पारदर्शिता – भूमि आवंटन और रोजगार से जुड़ी प्रक्रियाओं को सार्वजनिक किया जाए।
    सिंगरौली का पावर प्लांट केवल एक औद्योगिक परियोजना नहीं, बल्कि हजारों लोगों की आजीविका और जीवन से जुड़ा हुआ मुद्दा है। विकास तभी सार्थक है, जब वह सुरक्षित और समावेशी हो। यदि मजदूरों की जान की कीमत पर उद्योग चलेंगे, तो यह विकास नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक संकट होगा। अब समय आ गया है कि और सरकार दोनों मिलकर इस स्थिति को गंभीरता से लें और ठोस सुधारात्मक कदम उठाएं। मजदूर केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि इस विकास यात्रा के वास्तविक आधार हैं। उनकी सुरक्षा, सम्मान और अधिकार सुनिश्चित करना ही सच्चे अर्थों में प्रगति का पैमाना होना चाहिए।

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    *विजया पाठक की रिपोर्ट*

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