नई दिल्ली/स्वराज टुडे: ईरान के तेवर हल्के होने की एक और बड़ी वजह है. ये वजह हैं वो हथियारबंद गुट जिन्हें ईरान ने सालों से पाला-पोसा लेकिन एक बड़ा युद्ध सामने आते ही इन गुटों की हिम्मत जवाब दे गई. बमों और मिसाइलों के धमाकों के बीच ईरान के प्यादे किस तरह अपने बिल में छिपे हुए हैं. ये समझने के लिए आपको युद्ध के वर्तमान हालात को समझना चाहिए.
इक्का-दुक्का किए ड्रोन अटैक
इराक में ईरान समर्थित पांच हथियारबंद गुट सक्रिय हैं. इन गुटों को साझा तौर पर इस्लामिक रेजिस्टेंस इन इराक का नाम दिया जाता है. अमेरिका, इजरायल और ईरान के युद्ध में इन गुटों ने इक्का-दुक्का ड्रोन अटैक ही किए हैं. युद्ध के शुरुआती दिनों में सामरिक दुनिया के जानकार मानकर चल रहे थे कि ईरान समर्थित ये इस्लामिक रेज़िस्टेंस कम से कम इराक, कुवैत और सीरिया में अमेरिकी अड्डों को नुकसान पहुंचाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ है.
आखिर ऐसा क्या हुआ कि ईरान समर्थित गुटों ने अपने ही आका से मुंह मोड़ लिया. इस सवाल का जवाब भी हम आपको देंगे लेकिन उससे पहले आपको इराक के अंदर मौजूद ईरान समर्थित इन किरदारों को गौर से पहचानना चाहिए.
लड़ाकों की बड़ी फौज
ईरान के इस इस्लामिक रेज़िस्टेंस में सबसे बड़ा नाम है बद्र ऑर्गनाइजेशन जिसके पास 22 हजार हथियारबंद लड़ाके हैं. दूसरा बड़ा गुट है अहल-ए-हक जिसकी कमान तले 15 हजार लड़ाके हैं. तीसरा है कतैब-सैयद-अल-शुहादा. इस गुट में 10 हजार लड़ाके हैं. पांच संगठनों के इस समूह में चौथा किरदार है हरकत-ए-हिज्बुल्ला जिसके पास 8 हजार लड़ाके हैं और आखिरी गुट है कतैब हिज्बुल्ला. इस गुट में भी तकरीबन 10 हजार लड़ाके हैं.
इन सभी गुटों की संख्या को एक साथ जोड़ा जाए तो इस इस्लामिक रेज़िस्टेंस के झंडे तले तकरीबन 55 हजार लड़ाके हैं. इतनी बड़ी तादाद में हथियारबंद लड़ाके किसी भी देश और सरकार को चुनौती दे सकते हैं. इन लड़ाकों के पास एंटी-एयरक्राफ्ट गन, तोप और ड्रोन जैसे भारी हथियार भी हैं लेकिन ये जंग के मैदान में नहीं उतर रहे। अब हम आपको इन गुटों की मजबूरी या यूं कहें कि डर की वजह बताने जा रहे हैं.
मोसाद और यूएस का खौफ
इन गुटों के कमांडरों के अंदर सबसे बड़ा डर इस बात का है कि जिस तरह मोसाद की मदद से ईरान के नेताओं और कमांडरों को मारा गया है, वही हाल इन लोगों का भी हो सकता है. दूसरा बड़ा डर इराक की सरकार का है. अगर इन गुटों ने इराक की धरती पर अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचाया तो इराक इस इस्लामिक रेज़िस्टेंस के खिलाफ सैन्य कार्रवाई कर सकता है. दहशत की तीसरी बड़ी वजह है कुर्द लड़ाके जिन्हें अमेरिका का समर्थन हासिल है. ईरान समर्थित गुटों ने सैन्य कार्रवाई की तो घातक कुर्दों को अमेरिका ईरान के इन प्रॉक्सी संगठनों की तरफ मोड़ सकता है.
क्या पहुंच गया पैसा?
कुछ सामरिक हलकों में ये भी चर्चा है कि युद्ध शुरु होने से पहले इन गुटों को ईरान विरोधी पक्षों द्वारा पैसा पहुंचाया गया था. ये भी एक वजह है जिसकी वजह से इन पांच गुटों की बंदूकें अब तक खामोश हैं. कुछ ऐसा ही हाल यमन में ईरान समर्थित हूती आतंकियों का भी है. हूती आतंकी बार-बार अमेरिकी और इजरायली हमले की आलोचना कर रहे हैं लेकिन गाजा के युद्ध की तरह इस बार मिसाइल या ड्रोन नहीं दाग रहे हैं. ले देकर सिर्फ लेबनान में मौजूद हिज्बुल्ला एक ऐसा ईरान समर्थित गुट है जो इजरायल से लड़ रहा है लेकिन यहां आपको जानना चाहिए कि ये लड़ाई हिज्बुल्लाह ने ईरान के समर्थन में मोल नहीं ली है.
हिज्बुल्लाह ने तो खुद को जंग से दूर कर लिया था लेकिन जब इजरायल ने हिज्बुल्लाह पर ताबड़तोड़ हमले किए तो मजबूरन हिज्बुल्लाह को भी जवाबी कार्रवाई करनी पड़ी. हिंदी की एक कहावत है. सुख के सब साथी दुख में ना कोए. जब तक खामेनेई की हुकूमत इन गुटों को करोड़ों डॉलर देती रहती थी तब तक ये खामेनेई का झंडा उठाते रहते थे. आज खामेनेई नहीं हैं तो इन गुटों ने भी ईरान से किनारा कर लिया है.
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