● सोमनाथ की अनकही कथा
● एक ऐसी काहनी जिसे समय भी मिटा न सका
● ज्योतिर्लिंग के साक्षात् दर्शन के लिए कोरबा के घंटाघर ओपन थियेटर में 24/04/2026 को संध्या 06 बजे से रखा गया है ।
सदियों पहले, भारत की पश्चिमी तट पर, जहाँ सागर की लहरें धरती को स्पर्श करती थी, वह एक ऐसा मंदिर खड़ा था जिसे देखकर ऋषि-मुनि कहते ये इंट-पत्थरों से नहीं आस्था से बना है’ यह था सोमनाथ मंदिर और इसके गृह में विराजते भगवान शिव के प्रथम ज्योतिलिंग, यह ज्योतिर्लिंग साधारण नहीं था। संत लिखते हैं कि यह हवा में मंडराता था यानि किसी अदृश्य शक्ति ने थामा हुआ हो।
सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के पल भर के सानिध्य से जीवन भर के कष्ट हो जाते हैं दूर
लोग कहते थे कि एक पल इसके पास बैठ जाने से जीवन भर का दुख भुल जाता है। लेकिन प्रकाश होता है वहाँ अंधकार भी चोट करने की कोशिश करता है । 1020 ईस्वी के आसपास मुस्लिम आक्रमणकारी ने इस मंदिर की महिमा, इसके वैभव और उस रहस्यमयी चुंबकीय मंडराते शिवलिंग के बारे में सुना। लोभ और ईर्ष्या में अंधा होकर उसने 1020 से 1024 तक कई बार सोमनाथ पर आक्रमण किया। हर बार वह निस्फल हुआ। हर बार शिवलिंग अडिग रहा लेकिन 1026 ईस्वी में 18 प्रयासों के बाद, वह मंदिर को तोड़ने में सफल हो गया। सदियों से जगमगाता शिवलिंग खंड़ खंड़ कर दिया गया। शिवलिंग पर बार बार हुए हमले के कारण उसके टुकड़े बिखर गए। सोमनाथ पर एक भारी निःशब्दता छा गई। लेकिन दिव्य शक्ति को कोई नष्ट नहीं कर सकता। उसी अराजकता में कुछ पुजारियों का एक छोटा समूह टूटे हुए शिवलिंग के सभी टुकड़े समेट ले गया। जैसे कोई माँ अपने घायल बच्चे को बाहों में उसे लेकर जाती है वैसे ही भाग निकले।
हजारों किलोमीटर दूर दक्षिण भारत में दिव्य ज्योतिर्लिंग की स्थापना
वे हजारों किलोमीटर दक्षिण की ओर बढ़ चले। जंगली और अनजानी राहों से गजरते हुए दक्षिण भारत पहुँचे। उन्होंने उन टुकड़ों से नया शिवलिंग रखा और पुनःस्थापित किया और उसे गुप्त रूप से पुजनीय रखा। दुनिया भूल गई पर वे नहीं भूले। लगभग एक हजार वर्षों तक पीढ़ी दर पीढ़ी उन्होंने इसे छिपाकर रखा । प्रेम, तपस्या और समर्पण से इसकी रक्षा करते रहे। 1924 में कांचीपुरम के शंकराचार्य जी ने उन्हे एक दिव्य आदेश दिया। इस शिवलिंग की 100 वर्ष तक रक्षा करो। समय आने पर भारत स्वतंत्र होगा और राम मंदिर बनेगा तब इसे श्री श्री रविशंकर के हाथों सौंप देना। पुजारियों ने इस वचन को प्रण की तरह निभाया। 100 साल बाद 2025 में वह घड़ी आई। अंतिम संरक्षक सीताराम शास्त्री जी बेंगलुरू पहुंचे और भावनाओं से भरकर वह पवित्र शिवलिंग गुरूदेव श्री श्री रविशंकर जी को समर्पित किया। वह पल ऐसा था मानो इतिहास ने फिर से सांस ली हो।
शिवलिंग का परीक्षण कर वैज्ञानिक भी रह गए हैरान
इस दिव्य शिवलिंग का वैज्ञानिकों ने भी परीक्षण किए और ये देखकर चकित रह गये कि शिवलिंग में अत्यधिक चुंबकीय शक्ति है। जिस तत्व से शिवलिंग बना है वो इस धरती पर कहीं नहीं पाया जाता। इसमे ऐसी ऊर्जा है जिसे ना तो विज्ञान समझ पाया ना वैज्ञानिक।
हजार वर्षों तक सुरक्षित रहा यह खजाना फिर से दुनिया को अपना आशीर्वाद के लिए हुआ तैयार
गुरूदेव श्री श्री रविशंकर कहते हैं –
‘जब आप ऐसे शिवलिंग का दर्शन करते हैं, तो सिर्फ एक प्रतीक को नहीं देखते आप सदियों की तपस्या, लाखों भक्तों की प्रार्थनाओं और शुद्ध चेतना की लहरों से जुड़ते है।” आस्था पर चोट हो सकती है, पर आस्था कभी टूटती नहीं। सोमनाथ इसकी सबसे बड़ी मिसाल है।
कोरबा छत्तीसगढ़ की पावन धरा पर 24 अप्रैल को सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का कर सकेंगे दिव्य दर्शन
कोरबा छत्तीसगढ़ की पावन धरा पर “द आर्ट ऑफ़ लिविंग” के सानिध्य में सोमनाथ ज्योतिर्लिंग दर्शन एवं महासत्संग 24 अप्रैल 2026 को घंटाघर ओपन थियेटर में आयोजित है जहाँ इस दिव्य शिवलिंग को कोरबा वासियों के दर्शनार्थ लाया जाएगा। जिस कहानी की शुरूआत हजार साल पहले हुई जो विनाश से गुजारी… सनातनियों ने सहा… अब वह ज्योतिर्लिंग कोरबा छत्तीसगढ़ में नया अध्याय लिखने जा रही है।
सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के आगमन के संबंध में आयोजित प्रेसवार्ता में उपस्थित सदस्यगण
श्री मेदनी मिश्रा,
श्री श्याम अग्रवाल,
श्री अशोक तिवारी
श्री अमित चौबे
एवं आर्ट ऑफ़ लिविंग परिवार
आर्ट ऑफ़ लिविंग की आयोजन समिति ने कोरबा वासियों से अपील की है कि वे सपरिवार पधार कर इस ऐतिहासिक एवं दिव्या यात्रा का हिस्सा बनकर पुण्य के भागीदार बने ।


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