कोलकाता/स्वराज टुडे: पश्चिम बंगाल की सियासत में बुधवार को वो महाविस्फोट हो गया, जिसकी कल्पना खुद पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी नहीं की होगी. जिन मुस्लिम चेहरों, मंत्रियों और पुराने वफादारों को बचाने के लिए दीदी अक्सर पूरी दुनिया से बैर ले लेती थीं, आज उन्हीं ने वक्त बदलते ही ममता की पीठ में सबसे बड़ा छुरा घोंप दिया है.
मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के अभी कुछ ही दिन हुए थे कि टीएमसी के भीतर ऐतिहासिक बगावत हो गई और पार्टी दो धड़ों में बंट चुकी है. मुर्शिदाबाद से लेकर हावड़ा तक के कद्दावर मुस्लिम विधायकों और पूर्व मंत्रियों ने मिलकर ममता बनर्जी का साथ छोड़ दिया है और करीब 59 विधायकों के दस्तखत वाला पत्र लेकर विधानसभा पहुंच गए हैं.
कोलकाता के एमएलए हॉस्टल में रची गई बड़ी साजिश
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, टीएमसी को दो फाड़ करने की यह पटकथा रातों-रात नहीं लिखी गई है. मंगलवार की शाम को कोलकाता के एमएलए हॉस्टल में ऋतब्रत बनर्जी, संदीपन साहा और अन्य असंतुष्ट विधायकों के बीच एक गुप्त और बेहद महत्वपूर्ण बैठक हुई थी. इसी बैठक में ममता बनर्जी के साम्राज्य को चुनौती देने का अंतिम ब्लूप्रिंट तैयार किया गया था. बुधवार सुबह होते ही मुर्शिदाबाद, हावड़ा, वीरभूम और उत्तर दिनाजपुर जैसे भारी जनाधार वाले जिलों के विधायक एकजुट होकर विधानसभा पहुंच गए और उन्होंने स्पीकर को पत्र सौंपकर ऋतब्रत बनर्जी को नया विरोधी दल नेता बनाने की मांग कर दी.
दीदी की सरकार में मलाई काटने वाले मंत्रियों ने ऐन वक्त पर बदला पाला
टीएमसी के भीतर लगी इस आग की सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इसमें वे नाम शामिल हैं जिन्होंने सालों तक ममता सरकार में मलाई काटी है. पूर्व मंत्री और मालदा की कद्दावर नेता सबीना यास्मीन ने खुलेआम मीडिया के सामने ऐलान कर दिया है कि वे ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता मानती हैं. इसी तरह ममता के बेहद करीबी रहे पूर्व मंत्री जावेद खान, वीरभूम के दबंग नेता काजल शेख, और पूर्व मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा ने भी दीदी का हाथ छोड़ दिया है. चंद्रनाथ सिन्हा ने तो विधानसभा पहुंचकर बिना किसी झिझक के साफ कह दिया कि उन्हें ऋतब्रत का नेतृत्व पूरी तरह स्वीकार है.
मुस्लिम विधायकों की बगावत से दीदी के उड़े होश
ममता बनर्जी ने हमेशा जिस वोटबैंक और जिन मुस्लिम नेताओं के लिए अपनी पूरी राजनीतिक साख दांव पर लगा दी, आज उन्हीं नेताओं ने उन्हें सबसे गहरा जख्म दिया है. मुर्शिदाबाद और उत्तर बंगाल के इलाकों से आने वाले अधिकांश अल्पसंख्यक विधायकों ने इस बगावत को अपना खुला समर्थन दे दिया है. बागी गुट में शामिल प्रमुख मुस्लिम चेहरों में सामेशरगंज के विधायक मोहम्मद नूर आलम, मुर्शिदाबाद के कद्दावर नेता नियामत शेख और उत्तर दिनाजपुर के पूर्व मंत्री गुलाम रब्बानी शामिल हैं. ममता बनर्जी अक्सर इन नेताओं के संरक्षण के लिए विपक्ष और केंद्र सरकार से सीधे टकरा जाती थीं, लेकिन आज इन नेताओं ने पाला बदल लिया.
हावड़ा के कद्दावर नेताओं ने भी छोड़ी पार्टी
इस बगावत ने टीएमसी के शीर्ष नेतृत्व को इसलिए भी पस्त कर दिया है क्योंकि सिर्फ पुराने और अनुभवी नेता ही नहीं, बल्कि हावड़ा जिले के कई मजबूत स्तंभ भी टूट गए हैं. हावड़ा जिले से उदयनारायणपुर के विधायक समीर पांजा, डोमजूर के विधायक तापस मैती, हावड़ा मध्य से अरूप रॉय के अलावा उषा रानी मंडल, पिया पाल और गुलशन मल्लिक जैसी महिला विधायकों ने भी ममता बनर्जी का साथ छोड़ दिया है. नए और पुराने विधायकों का यह घातक कॉम्बिनेशन दिखाता है कि पार्टी के भीतर अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को लेकर असंतोष कितना गहरा था, जो अब खुलकर बाहर आ गया है.
जानें कौन हैं ऋतब्रत बनर्जी
ऋतब्रत बनर्जी ने वाम संगठन एसएफआई से छात्र राजनीति शुरू की, फिर 2020 में टीएमसी से जुड़ गए। टीएमसी ट्रेड यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष बने। 2014 में उन्हें राज्यसभा के लिए चुना गया। 2024 में वह दूसरी बार राज्यसभा सांसद बने। 2026 के विधानसभा चुनाव में वह उलूबेरिया पूरबा से जीते। फिलहाल उन्होंने टीएमसी में बगावत का झंडा बुलंद कर रखा है।
यह भी पढ़ें: Varanasi: आधी रात गरजा बाबा का बुलडोजर, महज 22 मिनट में ढहाई गई 42 फीट ऊंची ‘अजगैब शहीद मस्जिद’

Editor in Chief






