छत्तीसगढ़
जगदलपुर/स्वराज टुडे आजकल एक चपरासी की नौकरी के लिए भी सरकारी दफ्तरों में दस बार मार्कशीट और सर्टिफिकेट की जांच होती है। लेकिन छत्तीसगढ़ के जल संसाधन विभाग में ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ वाला सिस्टम चल रहा है। यहां बिना 10वीं-12वीं की मार्कशीट और बिना रोल नंबर के ही एक शख्स सीधे कार्यपालन अभियंता (ईई) की मलाईदार कुर्सी पर बैठ गया।
जगदलपुर में पदस्थ इंजीनियर वेदप्रकाश पाण्डेय का यह कारनामा किसी को भी हैरत में डालने के लिए काफी है। जिस सर्विस बुक के दम पर साहब सालों से सरकारी तनख्वाह और रुतबे का मजा लूट रहे हैं, उसमें उनकी पढ़ाई-लिखाई का कॉलम पूरी तरह से गोलमोल और फर्जीवाड़े की गवाही दे रहा है।
हवा में पास कर ली 10वीं और 12वीं?
इंजीनियर साहब की सर्विस बुक का ‘शैक्षणिक योग्यता’ वाला हिस्सा देखकर ऐसा लगता है मानो साहब ने हवा में ही पढ़ाई कर ली हो और सीधे इंजीनियर की कुर्सी पर ‘लैंडिंग’ कर गए हों। सर्विस बुक में लिखा है कि इन्होंने 2006 में हाई स्कूल (10वीं) पास की है। लेकिन न तो 10वीं का रोल नंबर दर्ज है और न ही 12वीं (हायर सेकेंडरी) का कोई अता-पता है। सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि सर्विस बुक के साथ इनकी कोई भी मार्कशीट या सर्टिफिकेट अटैच ही नहीं किया गया है। आखिर बिना रोल नंबर के विभाग के बाबुओं और अफसरों ने इन्हें पास कैसेजी मान लिया?
डिग्री का अता-पता नहीं, सिस्टम ने आंखों पर बांधी पट्टी

गड़बड़झाला सिर्फ स्कूली पढ़ाई तक सीमित नहीं है। एक इंजीनियर के लिए उसकी डिग्री सबसे अहम होती है, लेकिन वेदप्रकाश जी की डिग्री का पूरा विवरण ही अधूरा है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ शासन के 1979 से लेकर 1990 तक के सख्त नियम कहते हैं कि बिना पुख्ता दस्तावेजों के किसी की जॉइनिंग नहीं कराई जा सकती। लेकिन साल 2009 में जब इनकी जॉइनिंग हुई, तो सारे कायदे-कानून रद्दी की टोकरी में डाल दिए गए। सिस्टम ने आंखों पर पट्टी बांधकर इनकी जॉइनिंग करा दी।
अगर अब मार्कशीट जमा करें तो बारीकी से जांच
मामला खुलने के बाद शिकायतकर्ता ने शासन से सीधी और सख्त मांग की है। उनका कहना है कि अगर अब खुद को बचाने के लिए साहब कोई नई मार्कशीट या डिग्री लाकर जमा भी करते हैं, तो उस पर आंख मूंदकर भरोसा न किया जाए। उसकी जांच संबंधित शिक्षा बोर्ड से पूरी तरह गोपनीय (सीक्रेट) तरीके से कराई जानी चाहिए। क्योंकि जो सिस्टम इतने साल बिना कागजात के किसी को इंजीनियर बनाए रख सकता है, वहां फर्जी मार्कशीट का जुगाड़ होना कोई बड़ी बात नहीं है।
अब जल संसाधन विभाग के आला अफसरों पर सवालिया निशान है कि आखिर इस ‘बिना रोल नंबर वाले’ इंजीनियर पर वे इतने मेहरबान क्यों हैं? क्या प्रशासन इनकी डिग्रियों की असलियत सामने लाएगा या यह ‘मुन्नाभाई’ वाला खेल यूंही चलता रहेगा?

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