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    Home»Featured»Delhi: बेगुनाहों की जिंदगियों से खेलता भ्रष्ट तंत्र, दिल्ली में विभिन्न अग्निकांड हादसों में अब तक सैकड़ो लोगों की जा चुकी है जान, आखिर कब थमेगा ये सिलसिला ?
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    Delhi: बेगुनाहों की जिंदगियों से खेलता भ्रष्ट तंत्र, दिल्ली में विभिन्न अग्निकांड हादसों में अब तक सैकड़ो लोगों की जा चुकी है जान, आखिर कब थमेगा ये सिलसिला ?

    Deepak SahuBy Deepak SahuJune 10, 2026
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    n715461899178109689165577bcf9ca7bbfeb859b53ea9df7cf7ba17818345621c22205ee8fd454469517a7
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    नई दिल्ली/स्वराज टुडे: पिछले दिनों दिल्ली के मालवीय नगर स्थित हौजरानी क्षेत्र में हुए भीषण अग्निकांड ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि हमारे यहां हादसे अचानक नहीं होते बल्कि उन्हें पैदा किया जाता है। 21 लोगों की दर्दनाक मौत, दर्जनों घायल, धुएं में घुटती सांसें, तीसरी मंजिल से जान बचाने के लिए छलांग लगाते लोग और बेसमेंट के बाहर बंद पड़ा निकास द्वार, यह केवल एक दुर्घटना नहीं बल्कि प्रशासनिक विफलता, भ्रष्ट व्यवस्था और नियमों की खुलेआम हत्या का भयावह परिणाम था।

    दुखद यह है कि यह कोई नई कहानी नहीं है। दिल्ली बार-बार अग्निकांडों में जलती है, लोग बार-बार मरते हैं, जांच समितियां बनती हैं, मुआवजे घोषित होते हैं और फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। मालवीय नगर के हादसे में जो शुरुआती तथ्य सामने आए, वे किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर देने वाले थे। जिस भवन में ‘लेमन ग्रीन रेस्टोरेंट’ और ‘मिकासा होम्स’ संचालित हो रहे थे, वहां कथित रूप से छह कमरों की अनुमति के बावजूद 25 से अधिक कमरे बनाए गए थे। भवन से निकलने का केवल एक रास्ता था। बेसमेंट में लोगों की मौजूदगी के बावजूद बाहरी गेट पर ताला लगा था। आग लगने के बाद धुआं इतनी तेजी से फैला कि लोग बाहर निकल ही नहीं सके। कुछ लोगों ने तीसरी मंजिल से कूदकर जान बचाने की कोशिश की। यह दृश्य 1997 के उपहार सिनेमा अग्निकांड की भयावह यादों को फिर से ताजा कर गया, जहां बाहर निकलने के रास्ते बंद होने के कारण 59 लोगों की मौत हो गई थी।

    दिल्ली में अग्निकांडों का इतिहास बताता है कि हर बड़ी त्रासदी के पीछे कहानी लगभग एक जैसी है, अवैध निर्माण, सुरक्षा मानकों की अनदेखी, भ्रष्टाचार, फर्जी प्रमाणपत्र, बंद निकास द्वार और प्रशासनिक लापरवाही। 13 जून 1997 को हुए उपहार सिनेमा अग्निकांड में 59 लोगों की मौत हुई थी, जो दिल्ली का अब तक का सबसे भयावह अग्निकांड माना जाता है। आग लगने के बाद सिनेमा हॉल में धुआं भर गया और निकास मार्ग अवरुद्ध होने के कारण लोग बाहर नहीं निकल सके। पूरे देश को झकझोर देने वाले इस हादसे के बाद सुरक्षा नियमों को सख्त बनाने की बातें तो बहुत हुई लेकिन वास्तविकता यही है कि उनसे कोई स्थायी सबक नहीं लिया गया। 31 मई 1999 को लाल कुआं स्थित केमिकल गोदाम में लगी आग में 57 लोगों की मौत हो गई। उसके बाद भी अवैध गोदामों और रासायनिक इकाइयों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं लगाया गया। 8 दिसंबर 2019 को अनाज मंडी की अवैध फैक्टरी में लगी आग में 43 लोगों की मौत हुई। उस समय भी खुलासा हुआ था कि इमारत में निकास के पर्याप्त रास्ते नहीं थे, सीढ़ियां सामान से भरी थी और खिड़कियों पर लोहे की ग्रिलें लगी थी। जहरीले धुएं ने मजदूरों को सोते हुए ही मौत की नींद सुला दिया।

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    अग्निकांड हादसों की राजधानी बनी दिल्ली

    12 फरवरी 2019 को करोल बाग के अर्पित पैलेस होटल में लगी आग में 17 लोगों की जान गई। जांच में सामने आया कि होटल में अवैध निर्माण हुआ था और सुरक्षा उपकरण पर्याप्त नहीं थे। 2022 में मुंडका की व्यावसायिक इमारत में लगी आग में 27 लोगों की मौत हुई। वहां भी केवल एक निकास मार्ग था और सुरक्षा मानकों की घोर अनदेखी की गई थी। उसी वर्ष गोकुलपुरी की झुग्गी बस्ती में आग से 7 लोगों की जान चली गई। 2024 में अलीपुर की अवैध पेंट फैक्टरी में लगी आग में 11 लोगों की मौत हुई। 2026 में पालम और विवेक विहार में हुए अग्निकांडों में नौ-नौ लोगों की जान गई। अब मालवीय नगर की त्रासदी ने मृतकों की सूची में 21 और नाम जोड़ दिए हैं। दिल्ली फायर सर्विस के आंकड़े बताते हैं कि जनवरी 2026 से 27 मई 2026 तक आग की घटनाओं में 45 लोगों की मौत हो चुकी थी। इसके बाद विवेक विहार और मालवीय नगर की घटनाओं को जोड़ दें तो यह संख्या 67 से अधिक हो चुकी है। यह आंकड़ा केवल संख्या नहीं बल्कि उन परिवारों की बर्बादी का दस्तावेज है, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया।

    सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसी इमारतें बन कैसे जाती हैं? कैसे आवासीय भवनों में व्यावसायिक गतिविधियां चलने लगती हैं? कैसे छह कमरों की अनुमति वाले भवन में 25 कमरे बन जाते हैं? कैसे फायर एनओसी के बिना होटल, रेस्टोरेंट और फैक्ट्रियां वर्षों तक संचालित होती रहती हैं? कैसे चार मंजिल की अनुमति वाले क्षेत्र में छह-सात मंजिलें खड़ी हो जाती हैं? इन सवालों का जवाब किसी जांच आयोग की मोटी रिपोर्ट में नहीं बल्कि भ्रष्टाचार की उस जड़ में छिपा है, जिसने पूरे सिस्टम को खोखला कर दिया है। यदि कोई अवैध इमारत बनती है तो वह एक दिन में नहीं बनती। उसकी नींव पड़ती है, दीवारें उठती हैं, मंजिलें तैयार होती हैं, बिजली के कनेक्शन लगते हैं, पानी के कनेक्शन मिलते हैं और फिर व्यापार शुरू होता है। इस पूरी प्रक्रिया में अनेक सरकारी विभागों की आंखों के सामने सब कुछ होता है। इसलिए यह कहना कि प्रशासन को जानकारी नहीं थी, वास्तविकता से आंखें मूंदना होगा। सच यह है कि ऐसी अधिकांश इमारतें प्रशासन और कारोबारियों की मिलीभगत का परिणाम होती हैं।

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    हर हादसे के बाद राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप लगाते हैं। मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद और विधायक घटनास्थल पर पहुंचते हैं। जांच के आदेश दिए जाते हैं, मुआवजे की घोषणाएं होती हैं और कुछ अधिकारियों को निलंबित कर दिया जाता है। लेकिन क्या कभी किसी बड़े अधिकारी को कठोर दंड मिला? क्या कभी किसी विभागीय प्रमुख को जवाबदेह ठहराया गया? क्या कभी ऐसी कार्रवाई हुई कि भविष्य में कोई अधिकारी नियमों की अनदेखी करने का साहस न कर सके? दुर्भाग्य से जवाब है ‘नहीं’। मालवीय नगर का हादसा भी केवल एक होटल या रेस्टोरेंट की कहानी नहीं है। यह उस पूरे शहरी विकास मॉडल पर प्रश्नचिह्न है, जहां मुनाफा मानव जीवन से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। दिल्ली में हजारों ऐसी इमारतें हैं, जहां फायर सेफ्टी के उपकरण या तो हैं ही नहीं या केवल दिखावे के लिए लगाए गए हैं। अनेक भवनों में इमरजेंसी एग्जिट कागजों में मौजूद हैं लेकिन वास्तविकता में बंद पड़े हैं। कई जगहों पर बेसमेंट का उपयोग पार्किंग की बजाय व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा है। संकरी गलियों में बहुमंजिला भवन खड़े हैं, जहां दमकल की गाड़ियां तक नहीं पहुंच सकती।

    गंभीरता से हो इमारतों की सुरक्षा ऑडिट

    अब समय आ गया है कि केवल जांच और मुआवजे की राजनीति से आगे बढ़ा जाए। दिल्ली में सभी होटलों, गेस्ट हाउसों, रेस्टोरेंटों, अस्पतालों, फैक्ट्रियों और बहुमंजिला इमारतों का व्यापक सुरक्षा ऑडिट कराया जाए। फायर एनओसी की व्यवस्था डिजिटल और पारदर्शी बने। अवैध निर्माण पर केवल जुर्माना नहीं बल्कि तत्काल ध्वस्तीकरण हो। सुरक्षा मानकों की अनदेखी करने वाले भवन मालिकों और जिम्मेदार अधिकारियों पर गैर-इरादतन हत्या नहीं बल्कि कठोर आपराधिक मुकदमे दर्ज हों। जब तक जवाबदेही की तलवार ऊपर तक नहीं पहुंचेगी, तब तक नीचे कोई नहीं सुधरेगा। मालवीय नगर की आग में मारे गए लोग किसी राजनीतिक बहस का हिस्सा नहीं थे, वे आम नागरिक थे, जिनमें महिलाएं थी, विदेशी नागरिक थे, मरीजों के परिजन थे और बेहतर जीवन की उम्मीद लेकर वहां ठहरे हुए लोग थे। आज जरूरत शोक व्यक्त करने से ज्यादा आत्ममंथन की है। उपहार कांड से लेकर मालवीय नगर तक लगभग तीन दशक बीत चुके हैं लेकिन व्यवस्था की मानसिकता नहीं बदली। यदि इस बार भी कुछ दिनों के शोर-शराबे के बाद सब कुछ सामान्य हो गया तो यकीन मानिए, अगला अग्निकांड केवल समय का प्रश्न होगा। तब फिर वही सवाल गूंजेगा कि आखिर बेगुनाह लोगों की जान से खेलते इस सिस्टम का जिम्मेदार कौन है?

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    Deepak Sahu

    Editor in Chief

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