नई दिल्ली/स्वराज टुडे: UPSC सिविल सेवा परीक्षा पास करना हजारों युवाओं का सपना होता है। लेकिन 2025 की परीक्षा में सफल हुए 958 उम्मीदवारों के लिए अब नियुक्ति और ट्रेनिंग का इंतजार लंबा हो गया है। इनमें IAS, IPS और दूसरी केंद्रीय सेवाओं में जाने वाले उम्मीदवार शामिल हैं। वजह है OBC क्रीमी लेयर के नियमों को लेकर चल रहा कानूनी विवाद।
सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद आरक्षण तय करने के तरीके पर सवाल उठे हैं। केंद्र सरकार ने इस फैसले को लागू करने के तरीके पर अदालत से स्पष्टीकरण मांगा है। फिलहाल सर्विस अलॉटमेंट और फाउंडेशन कोर्स की प्रक्रिया अटकी हुई है।
OBC Creamy Layer क्या है? आरक्षण का पूरा गणित समझिए
OBC वर्ग के सभी उम्मीदवारों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण का फायदा नहीं मिलता। इसके लिए क्रीमी लेयर और नॉन-क्रीमी लेयर का नियम लागू होता है। जो उम्मीदवार तय शर्तों के तहत OBC नॉन-क्रीमी लेयर में आते हैं, वे आरक्षण का लाभ ले सकते हैं। वहीं, क्रीमी लेयर में आने वाले उम्मीदवार OBC आरक्षण के पात्र नहीं होते।
विवाद तब सामने आता है, जब उम्मीदवार के माता-पिता प्राइवेट कंपनी, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी यानी PSU, यूनिवर्सिटी या किसी दूसरे संस्थान में काम करते हैं। ऐसे मामलों में यह तय करना आसान नहीं होता कि माता-पिता की नौकरी और उनकी स्थिति को किस तरह देखा जाए। सवाल सिर्फ कमाई का नहीं, बल्कि पद और नौकरी के स्तर का भी है।
11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 के फैसले में कहा कि OBC उम्मीदवार को क्रीमी लेयर में रखने का फैसला सिर्फ माता-पिता की आमदनी के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए उनकी नौकरी की प्रकृति, पद के स्तर और लागू नियमों को भी देखना होगा।
इसे दो उदाहरणों से समझिए। किसी प्राइवेट कंपनी में काम करने वाले व्यक्ति की सैलरी ज्यादा हो सकती है, लेकिन उनका पद शुरुआती स्तर का हो सकता है। दूसरी तरफ, किसी सरकारी कर्मचारी के पास ऊंचा पद हो सकता है। दोनों की आमदनी करीब-करीब बराबर होने के बावजूद उनकी नौकरी की स्थिति अलग हो सकती है।
अदालत की टिप्पणी का मकसद ऐसे मामलों में नियमों को सही ढंग से लागू करना और समान स्थिति वाले उम्मीदवारों के साथ अलग-अलग व्यवहार से बचना है।
958 नए अफसरों की ट्रेनिंग क्यों अटकी?
इस पूरे मामले को समझने के लिए घटनाक्रम पर नजर डालना जरूरी है। पहले UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 का रिजल्ट आया और 958 उम्मीदवार सफल हुए। इसके बाद 11 मार्च 2026 के फैसले ने OBC क्रीमी लेयर तय करने के तरीके पर कानूनी स्थिति स्पष्ट की। अब केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा है कि इस फैसले को किस तरह लागू किया जाए और क्या इसका असर पहले लिए गए फैसलों पर भी पड़ेगा।
इसी स्पष्टीकरण का इंतजार सर्विस अलॉटमेंट की प्रक्रिया को प्रभावित कर रहा है। जब तक उम्मीदवारों की सेवा तय नहीं होती, उनके प्रशिक्षण की आगे की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है। इस वजह से नए चयनित उम्मीदवारों को IAS, IPS, IRS या दूसरी केंद्रीय सेवाओं में जाने के बाद की औपचारिकताओं के लिए इंतजार करना पड़ रहा है।
क्या होता है Foundation Course और क्यों है जरूरी?
UPSC में चयन के बाद उम्मीदवारों को उनकी रैंक, पसंद और लागू नियमों के आधार पर अलग-अलग सेवाएं मिलती हैं। इसके बाद उन्हें फाउंडेशन कोर्स करना होता है। यह ट्रेनिंग मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी यानी LBSNAA या उससे जुड़ी संस्थाओं में होती है।
इस दौरान नए अधिकारियों को संविधान, सरकारी कामकाज, प्रशासन और पब्लिक पॉलिसी की बुनियादी जानकारी दी जाती है। यह कोर्स अलग-अलग सेवाओं में जाने वाले अधिकारियों को प्रशासनिक काम के लिए तैयार करने की शुरुआती प्रक्रिया है।
इस देरी का असर सिर्फ ट्रेनिंग की तारीख पर नहीं पड़ सकता। दिए गए विवरण के मुताबिक, सिविल सेवा में वरिष्ठता की गणना फाउंडेशन कोर्स शुरू होने से जुड़ी होती है। ऐसे में देरी से जॉइनिंग शेड्यूल और करियर की आगे की टाइमलाइन पर भी असर पड़ने की आशंका है। हालांकि इसका वास्तविक असर लागू नियमों और अंतिम फैसले पर निर्भर करेगा।
पहले के करीब 100 OBC उम्मीदवारों का क्या होगा?
इस विवाद का असर सिर्फ 2025 में चुने गए उम्मीदवारों तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट में करीब 100 ऐसे उम्मीदवारों का भी जिक्र है, जिन्होंने पिछले वर्षों में UPSC परीक्षा पास की थी, लेकिन उनकी OBC आरक्षण की मांग खारिज कर दी गई थी। उन्हें क्रीमी लेयर में रखा गया था।
अब जब क्रीमी लेयर तय करने के तरीके पर सुप्रीम कोर्ट की नई व्याख्या सामने आई है, तो इन पुराने मामलों पर भी सवाल उठ रहे हैं। यह स्पष्ट होना बाकी है कि नए फैसले का उन उम्मीदवारों पर क्या असर होगा और क्या उनके मामलों की दोबारा जांच की जा सकती है।
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से क्या मांगा?
केंद्र सरकार ने अदालत के सामने दो प्रमुख मांगें रखी हैं। पहली, पहले पूरे हो चुके दाखिलों, दी गई डिग्रियों और अन्य तय अधिकारों को नए फैसले के चलते अपने आप दोबारा न खोला जाए। दूसरी, सरकार को नियम लागू करने की तैयारी के लिए दो साल का समय दिया जाए।
सरकार को यह तय करने के लिए भी समय चाहिए कि प्राइवेट कंपनियों, PSU और दूसरे संस्थानों में कौन-से पद सरकारी सेवाओं के पदों के बराबर माने जा सकते हैं। यही तुलना क्रीमी लेयर के फैसले में अहम हो सकती है।
बताया गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने 24 सितंबर को सरकार की मांग पर सुनवाई के बाद अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था। इसका मतलब है कि अदालत ने इस मुद्दे पर सुनवाई पूरी कर ली थी, लेकिन उस समय तक फैसला सुनाया नहीं था।
अब 958 उम्मीदवारों को किस बात का इंतजार?
पूरे विवाद की जड़ OBC क्रीमी लेयर तय करने का तरीका है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ माता-पिता की कमाई को आधार नहीं बनाया जा सकता। केंद्र सरकार अब यह स्पष्ट कराना चाहती है कि नए नियमों को पुराने मामलों और अलग-अलग तरह की नौकरियों पर कैसे लागू किया जाए।
जब तक अदालत का स्पष्टीकरण और आगे की प्रक्रिया साफ नहीं होती, 958 नए चयनित उम्मीदवारों के सर्विस अलॉटमेंट और फाउंडेशन कोर्स पर अनिश्चितता बनी रह सकती है। साथ ही, पहले के करीब 100 उम्मीदवारों के मामलों का भविष्य भी स्पष्ट होना बाकी है। इस मामले में अगला कानूनी कदम ही तय करेगा कि भर्ती और ट्रेनिंग की प्रक्रिया कब आगे बढ़ेगी।
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