Railway Track Ballast: इंडियन रेलवे के ट्रैक पर आपने हमेशा छोटे-छोटे पत्थर देखे होंगे। लेकिन मेट्रो के ट्रैक पर ये पत्थर नहीं होते। आइए समझते हैं कि इन दोनों ट्रैक सिस्टम में क्या अंतर है और रेलवे ट्रैक पर पत्थर क्यों बिछाए जाते हैं।
रेलवे ट्रैक के नीचे बिछे इन पत्थरों को ट्रैक बैलास्ट (track ballast) कहते हैं। ये ट्रैक को स्थिर और सुरक्षित रखते हैं। ट्रेनें बहुत भारी होती हैं और उनका वजन ट्रैक पर भारी दबाव डालता है। इस वजन को सहने के लिए पटरियों को स्लीपर (कंक्रीट या लकड़ी के बीम) पर बिछाया जाता है। स्लीपर पटरियों के बीच सही दूरी बनाए रखते हैं और ट्रेन का वजन बांटते हैं। स्लीपर के नीचे और आसपास मौजूद पत्थर इन्हें मजबूती से अपनी जगह पर टिकाए रखते हैं। ये पत्थर चलती ट्रेन से पैदा होने वाले कंपन को भी कम करते हैं, जिससे ट्रैक सुरक्षित रहता है।

रेलवे ट्रैक बनाने के लिए किसी भी आम पत्थर का इस्तेमाल नहीं होता। इसके लिए खास आकार के सख्त और कुचले हुए पत्थरों का उपयोग किया जाता है। गोल और चिकने पत्थरों के बजाय, इन पत्थरों के किनारे नुकीले और आकार टेढ़े-मेढ़े होते हैं। इस वजह से ये आपस में अच्छी तरह फंस जाते हैं और ट्रैक को खिसकने से रोकते हैं। जब ट्रेनें बार-बार गुजरती हैं, तो ट्रैक पर भारी दबाव और कंपन होता है। बैलास्ट ट्रैक को इस दबाव को सहने और स्थिर रहने में मदद करता है। हालांकि, समय के साथ ये पत्थर घिस या खिसक सकते हैं। इसलिए रेलवे कर्मचारी नियमित रूप से ट्रैक की जांच करते हैं और सुरक्षा बनाए रखने के लिए जरूरत पड़ने पर पत्थरों को बदलते या ठीक करते हैं।

ट्रैक बैलास्ट के कई अहम फायदे हैं जो रेलवे लाइन को सुरक्षित और स्थिर रखते हैं।
वजन बांटना: यह ट्रेन के वजन को पटरियों से स्लीपर और फिर जमीन तक ट्रांसफर करता है।
कंपन कम करना: ये पत्थर चलती ट्रेनों से पैदा होने वाले कंपन को सोख लेते हैं।
जल निकासी: पत्थरों के बीच की जगह से बारिश का पानी आसानी से निकल जाता है। इससे ट्रैक के आसपास पानी जमा नहीं होता और जमीन कमजोर नहीं पड़ती।
खरपतवार रोकना: बैलास्ट रेलवे ट्रैक के आसपास जंगली घास और पौधों को उगने से रोकता है।
आसान मेंटेनेंस: जरूरत पड़ने पर रेलवे कर्मचारी बैलास्ट और स्लीपर की मदद से ट्रैक की स्थिति को आसानी से ठीक कर सकते हैं।
हालांकि, बैलास्ट रेलवे के शोर को पूरी तरह से नहीं रोकता। शोर का स्तर ट्रेन की डिजाइन, ट्रैक के प्रकार और रेलवे लाइन के किनारे लगे साउंड-कंट्रोल सिस्टम पर निर्भर करता है।

कई मेट्रो सिस्टम एक अलग डिजाइन का इस्तेमाल करते हैं जिसे बैलास्टलेस ट्रैक (ballastless track) कहा जाता है। पटरियों के नीचे पत्थर बिछाने के बजाय, इंजीनियर पटरियों को एक ठोस कंक्रीट स्लैब या खास तौर पर बनाए गए मजबूत बेस पर फिक्स करते हैं। यह सिस्टम एक स्थिर बेस देता है और पटरियों की सटीक अलाइनमेंट बनाए रखता है। यह एलिवेटेड पुलों और अंडरग्राउंड सुरंगों के अंदर बनी मेट्रो लाइनों के लिए बहुत उपयोगी है, जहां जगह, स्ट्रक्चरल डिजाइन और मेंटेनेंस का खास ध्यान रखना पड़ता है। बैलास्टलेस ट्रैक में पत्थरों को बदलने या ठीक करने जैसे नियमित मेंटेनेंस की जरूरत भी कम होती है। हालांकि, हर मेट्रो लाइन इस सिस्टम का इस्तेमाल नहीं करती। कुछ मेट्रो रूट, खासकर जमीन के स्तर पर बने कुछ हिस्सों में, पत्थरों वाले पारंपरिक ट्रैक का इस्तेमाल हो सकता है। यह चुनाव हर रूट की डिजाइन और जरूरत पर निर्भर करता है।

पारंपरिक रेलवे ट्रैक और कई मेट्रो ट्रैक के बीच मुख्य अंतर सिर्फ पत्थरों का होना या न होना नहीं है। इनके बनाने के तरीके, संचालन की जरूरतें और मेंटेनेंस की मांग भी अलग-अलग होती हैं। पारंपरिक रेलवे लाइनों पर, पटरियां, स्लीपर और बैलास्ट मिलकर ट्रेन के वजन को संभालते हैं और ट्रैक को स्थिर रखते हैं। वहीं, बैलास्टलेस मेट्रो सिस्टम में, एक कंक्रीट बेस और खास फास्टनिंग सिस्टम पटरियों को मजबूती से अपनी जगह पर पकड़े रहते हैं। इंजीनियर कई बातों को ध्यान में रखकर ट्रैक का डिजाइन चुनते हैं, जैसे ट्रेन का वजन, स्पीड, कंपन, उपलब्ध जगह और यह कि रूट जमीन पर है, एलिवेटेड है या सुरंग से होकर गुजरता है।
यह भी पढ़ें: Korba: उल्लास साक्षरता कार्यक्रम पुणे की राष्ट्रीय कार्यशाला में शामिल हुई ज्योति शर्मा

Editor in Chief

