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    Home»Featured»IAS बनना है जितना मुश्किल, उससे भी कठिन है आईएएस की नौकरी छोड़ना, जानें क्या है नियम-कायदे
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    IAS बनना है जितना मुश्किल, उससे भी कठिन है आईएएस की नौकरी छोड़ना, जानें क्या है नियम-कायदे

    Deepak SahuBy Deepak SahuMarch 29, 2026
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    n7063852251774766017206b8102756f7e774190a56c96014f4ad6557f9c5d4ad8f03cd8f2ee3bffd6af3b1
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    नई दिल्ली/स्वराज टुडे: भारत में हर साल लाखों उम्मीदवार आईएएस ऑफिसर (IAS Officer) बनने का सपना लेकर यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में शामिल होते हैं, लेकिन केवल 180 उम्मीदवार ही IAS बनने का सपना पूरा कर पाते हैं.

    दरअसल, आईएएस के पद को देश में काफी प्रतिष्ठित माना जाता है और इस प्रतिष्ठित नौकरी को हासिल करना काफी मुश्किल है. लेकिन अलग हम आपसे यह कहें कि यह नौकरी पाना जितना मुश्किल है, उसे अधिक मुश्किल इस नौकरी को छोड़ना है, तो शायद आपको इस बात पर यकीन ना हो.

    दरअसल, IAS जैसी प्रतिष्ठित नौकरी को छोड़ना जितना आसान सुनने में लगता है, उतना होता नहीं है. एक आईएएस अधिकारी सिर्फ इस्तीफा देकर तुरंत सेवा से बाहर नहीं हो सकता, बल्कि इसके लिए लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया, जांच और कई स्तरों की मंजूरी से गुजरना पड़ता है. कई बार तो इस्तीफा महीनों ही नहीं, बल्कि सालों तक लंबित रह सकता है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर IAS की नौकरी छोड़ना इतना मुश्किल क्यों है और इसके पीछे क्या नियम-कायदे काम करते हैं?

    दरअसल, साल 2012 बैच के IAS अधिकारी कन्नन गोपीनाथन (Kannan Gopinathan) ने साल 2019 में कश्मीर में अभिव्यक्ति की आजादी पर पाबंदियों के विरोध में अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया था. लेकिन हैरानी की बात यह है कि उनका इस्तीफा अब तक यानी करीब 6 साल बाद भी स्वीकार नहीं हुआ है. उन्होंने आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार जानबूझकर उनके इस्तीफे को रोक रही है, जिसकी वजह से वह केरल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर चुनाव नहीं लड़ पा रहे हैं. उन्होंने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर संबोधित करते हुए इसे ‘उत्पीड़न’ बताया है.

    राजनीति में हिस्सा लेने पर क्या हैं नियम?

    कन्नन गोपीनाथन ने अगस्त 2019 में इस्तीफा दिया था, जब जम्मू और कश्मीर में आर्टिकल 370 हटाने के बाद कई पाबंदियां लगाई गई थीं. बाद में अक्टूबर 2025 में उन्होंने कांग्रेस जॉइन कर ली और उन्हें केरल की पलक्कड़ सीट से उम्मीदवार बनाने की चर्चा थी. लेकिन नियम कहते हैं कि कोई भी सरकारी कर्मचारी किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़ नहीं सकता और न ही किसी राजनीतिक गतिविधि में हिस्सा ले सकता है.

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    साल 2014 में संशोधित All India Services (Conduct) Rules के मुताबिक हर सरकारी कर्मचारी को राजनीतिक रूप से निष्पक्ष रहना जरूरी है और संविधान की सर्वोच्चता बनाए रखना उसकी जिम्मेदारी है. चूंकि गोपीनाथन का इस्तीफा अब तक मंजूर नहीं हुआ है, इसलिए उनकी स्थिति अभी भी एक सरकारी अधिकारी की ही मानी जा रही है.

    IAS अधिकारी इस्तीफा कैसे देता है?

    दरअसल, आईएएस (IAS), आईपीएस (IPS) और इंडियन फॉरेस्ट सर्विस (Indian Forest Service) के अधिकारियों का इस्तीफा All India Services (Death-cum-Retirement Benefits) Rules, 1958 के तहत होता है. अगर कोई अधिकारी अपने स्टेट कैडर में काम कर रहा है, तो वह अपना इस्तीफा राज्य के चीफ सेक्रेटरी को देता है. वहीं, अगर वह केंद्र में प्रतिनियुक्ति (Deputation) पर है, तो उसे संबंधित मंत्रालय के सचिव को इस्तीफा देना होता है.

    कन्नन गोपीनाथन AGMUT कैडर से थे, इसलिए उनका मामला गृह मंत्रालय के जरिए आगे बढ़ता है. इसके बाद संबंधित राज्य और केंद्र सरकार मिलकर जांच करते हैं और अंत में DoPT (Department of Personnel and Training) को भेजते हैं, जहां अंतिम फैसला लिया जाता है. वहीं, IAS अधिकारियों के इस्तीफे पर अंतिम निर्णय प्रधानमंत्री ही लेते हैं.

    इस्तीफे के बाद क्या प्रक्रिया होती है?

    इस्तीफा मिलने के बाद सबसे पहले यह जांच की जाती है कि अधिकारी पर कोई बकाया, जांच या भ्रष्टाचार का मामला तो नहीं है. अगर ऐसा कुछ होता है, तो इस्तीफा खारिज भी किया जा सकता है. इसके बाद राज्य सरकार अपनी रिपोर्ट और सिफारिश केंद्र को भेजती है.

    इसके अलावा यह भी देखा जाता है कि अधिकारी ने किसी ट्रेनिंग या स्कॉलरशिप के बदले सरकार के साथ कोई बॉन्ड तो नहीं साइन किया है. अगर ऐसा होता है और अधिकारी समय से पहले इस्तीफा देता है, तो उसे जुर्माना भरना पड़ सकता है. उदाहरण के तौर पर अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) को IRS से इस्तीफा देने के बाद करीब 9 लाख रुपये का जुर्माना देना पड़ा था.

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    क्या सरकार इस्तीफा रोक सकती है?

    नियमों में इस्तीफा स्वीकार करने की कोई तय समय सीमा नहीं है. हालांकि, 1988 के DoPT सर्कुलर में कहा गया है कि अगर कोई अधिकारी काम नहीं करना चाहता, तो उसे जबरन रोकना सही नहीं है. लेकिन कुछ खास परिस्थितियों में इस्तीफा रोका जा सकता है – जैसे अधिकारी पर जांच चल रही हो, या वह किसी महत्वपूर्ण पद पर हो और उसकी जगह नया अधिकारी नियुक्त करने में समय लग रहा हो.

    कन्नन गोपीनाथन के मामले में क्या हुआ?

    गोपीनाथन ने अगस्त 2019 में इस्तीफा दिया था, लेकिन सितंबर 2019 में ही उन्हें दादरा और नगर हवेली के पावर डिपार्टमेंट में सचिव के रूप में पोस्ट कर दिया गया. इसके बाद गृह मंत्रालय ने उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू कर दी और मीडिया से बिना अनुमति बात करने जैसे आरोप लगाए गए.

    कोविड-19 महामारी के दौरान जब उन्हें वापस ड्यूटी पर आने को कहा गया और उन्होंने मना कर दिया, तो अप्रैल 2020 में उनके खिलाफ FIR भी दर्ज की गई. इस FIR में IPC की धारा 188, Epidemic Diseases Act और Disaster Management Act के तहत आरोप लगाए गए.

    अब तक कितने IAS अधिकारियों ने दिया इस्तीफा?

    RTI के अनुसार, साल 2010 से अब तक कुल 31 IAS अधिकारियों ने इस्तीफा दिया है. इनमें से 2010 से 2014 के बीच 11 अधिकारियों ने और 2015 से मई 2025 तक 20 अधिकारियों ने इस्तीफा दिया. कई अधिकारी बाद में राजनीति में भी आए, जैसे – अश्विनी वैष्णव (Ashwini Vaishnaw) और ओ. पी. चौधरी (O. P. Choudhary). वहीं, AGMUT कैडर के कशिश मित्तल (Kashish Mittal) ने 2019 में इस्तीफा दिया था, जिसे उसी साल स्वीकार भी कर लिया गया था.

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    क्या इस्तीफा वापस लिया जा सकता है?

    कुछ मामलों में अधिकारी अपना इस्तीफा वापस भी ले सकते हैं. जैसे शाह फैसल (Shah Faesal) ने 2019 में इस्तीफा दिया था, लेकिन 2022 में वापस लेकर फिर से सेवा में लौट आए. नियम कहते हैं कि अगर इस्तीफा अभी स्वीकार नहीं हुआ है, तो अधिकारी लिखित में इसे वापस ले सकता है.

    हालांकि, अगर कोई अधिकारी राजनीति में जाने के लिए इस्तीफा देता है, तो आमतौर पर उसे वापस लेने की अनुमति नहीं दी जाती. लेकिन शाह फैसल के मामले में उनका इस्तीफा भी लंबे समय तक लंबित रहा, इसलिए उन्हें वापसी का मौका मिल गया.

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    Deepak Sahu

    Editor in Chief

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