Zara success story: ज़ारा के मालिक ने बचपन में इतनी गरीबी देखी, जिसकी कोई हद नहीं थी. 14 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़कर डिलीवरी बॉय का काम किया. इसी दौरान उसने अपने बिजनेस का सपना देखा और ज़ारा (Zara) की स्थापना की. उसका मकसद था कि लग्जरी फैशन आम आदमी की पहुंच में हो, फिर चाहे महंगे ब्रांड्स को कॉपी ही क्यों न करना पड़े. कहते हैं कि इनके डिजाइनर दुनियाभर में घूमते रहते हैं और जहां भी कुछ अच्छा दिखता है, उसका स्केच कंपनी को भेज देते हैं. आज ज़ारा का साम्राज्य बिलियन डॉलर्स का है.
मां की आंखों में बेबसी देखकर ले लिया बड़ा संकल्प
स्पेन के एक छोटे से शहर की गलियों में एक छोटा-सा बच्चा अपनी मां का हाथ पकड़े चल रहा था. शाम का वक्त था और घर में खाने के लिए राशन खत्म हो चुका था. मां उसे लेकर एक किराने की दुकान पर पहुंची और दुकानदार से गुजारिश की कि क्या उसे थोड़ा सामान उधार मिल सकता है? दुकानदार ने बिना किसी हमदर्दी के साफ मना कर दिया और कहा कि पिछला हिसाब चुकाए बिना अब एक दाना भी नहीं मिलेगा. उस बच्चे ने अपनी मां की आंखों में वो बेबसी देखी, जिसे वह पूरी जिंदगी नहीं भूल पाया. उस दिन से ठान लिया था कि भविष्य में कुछ ऐसा करेगा कि उसकी पीढ़ी में किसी को फिर से वैसी हालत में न जीना पड़े. उस बच्चे का नाम था अमानसियो ओर्टेगा (Amancio Ortega), जिसने आगे चलकर दुनिया को ज़ारा (Zara) जैसा फैशन ब्रांड दिया और अमीरियत की नई कहानी रच दी.
गरीबी के चलते 14 साल की उम्र में छूट गई पढ़ाई, घर चलाने बन गए डिलीवरी बॉय
अमानसियो का बचपन बहुत ही तंगहाली में बीता था. उनके पिता रेलवे में एक मामूली कामगार थे और घर का गुज़ारा बड़ी मुश्किल से होता था. घर के हालात इतने खराब थे कि महज 14 साल की उम्र में उन्हें अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी. पढ़ाई छोड़ने के बाद उन्होंने एक कपड़ों की दुकान पर डिलीवरी बॉय का काम शुरू किया. वह दुकान अमीरों के लिए शर्ट बनाती थी. अमानसियो का काम था तैयार कपड़ों को कस्टमर्स के घर तक पहुंचाना. यहीं से उनकी जिंदगी का वो सफर शुरू हुआ, जिसने उन्हें कपड़ों की दुनिया का जादूगर बना दिया. वह घंटों बैठकर देखते थे कि कैसे कपड़ा काटा जाता है, कैसे सिलाई होती है और कैसे एक साधारण-सा कपड़ा किसी अमीर आदमी की पसंद बन जाता है.
काम करते-करते अमानसियो को एक बात समझ में आ गई थी कि फैशन सिर्फ अमीरों की जागीर नहीं होना चाहिए. उन्होंने देखा कि बड़े-बड़े डिजाइनर जो कपड़े रैंप पर दिखाते हैं, उन्हें आम आदमी कभी नहीं खरीद पाता क्योंकि उनकी कीमत आसमान छूती थी. उनके मन में एक विचार आया कि क्या ऐसा हो सकता है कि वही स्टाइलिश और फैशनेबल कपड़े एक आम इंसान की पहुंच में हों? लेकिन ये इतना आसान नहीं था. उस जमाने में कपड़े बनने और दुकान तक पहुंचने में महीनों का समय लगता था. अमानसियो ने इसी सिस्टम को बदलने का फैसला किया.
महंगे ब्रांड्स की नकल से शुरू किया काम
शुरुआत में उनके पास ज्यादा पैसे नहीं थे. उन्होंने अपनी पत्नी रोजालिया के साथ मिलकर घर के एक छोटे से कमरे में ही काम शुरू किया. उन्होंने सबसे पहले हाथ से बनी हुई नाइटी और बाथरोब बनाने शुरू किए. ये कपड़े उन महंगे ब्रांड्स की नकल थे, जिन्हें आम महिलाएं सिर्फ दुकानों के बाहर से देखकर छोड़ देती थीं. अमानसियो ने वही डिजाइन बहुत ही कम दाम में बेचना शुरू किया. उनका ये छोटा-सा प्रयोग सफल रहा और लोगों को उनके कपड़े बहुत पसंद आने लगे. करीब दस साल तक उन्होंने इसी तरह छोटे स्तर पर काम किया और पैसा जोड़ते रहे.
1975 में अमानसियो ने स्पेन के ला कोरुना में अपना पहला स्टोर खोला
1975 में अमानसियो ने स्पेन के ला कोरुना में अपना पहला स्टोर खोला. पहले वह इसका नाम ‘ज़ोरबा’ रखना चाहते थे, लेकिन उस नाम की एक फिल्म और एक बार पहले से मौजूद था. इसलिए उन्होंने अक्षरों को थोड़ा अदल-बदल कर नाम रखा – ज़ारा. यह स्टोर अमानसियो के उसी सपने की पहली सीढ़ी थी, जहां वह फैशन को आम लोगों तक पहुंचाना चाहते थे. ज़ारा के स्टोर में एक खास बात थी, वहां कपड़े बहुत तेजी से बदलते थे. अगर कोई डिजाइन आज आया है तो जरूरी नहीं कि वह अगले हफ्ते भी वहां मिले.
ज़ारा ने पकड़ ली ग्राहकों की नब्ज
आम तौर पर बड़ी कंपनियां साल में दो बार नए डिजाइन लाती हैं, लेकिन ज़ारा ने इस नियम को पूरी तरह बदल दिया. अमानसियो ने देखा कि लोगों की पसंद बहुत जल्दी बदलती है. इसलिए उन्होंने अपनी टीम को निर्देश दिया कि जैसे ही बाजार में या किसी बड़े इवेंट में कोई नया फैशन दिखे, उसके डिजाइन तुरंत तैयार करो और दो हफ्ते के अंदर वो कपड़ा स्टोर में होना चाहिए. जहां दूसरी कंपनियों को नए डिजाइन बाजार में लाने में छह महीने लगते थे, वहीं ज़ारा ने यह काम सिर्फ पंद्रह दिनों में कर दिखाया. इस मॉडल को ‘फास्ट फैशन’ कहा गया.
ज़ारा ने कभी भी बड़े विज्ञापनों पर पैसा खर्च नहीं किया. उनका मानना था कि उनके स्टोर की लोकेशन और वहां मिलने वाले कपड़े ही उनके सबसे बड़े विज्ञापन हैं. उन्होंने दुनिया के सबसे महंगे इलाकों में अपने स्टोर खोले, ताकि लोगों को लगे कि यह एक लग्जरी ब्रांड है, लेकिन जब लोग अंदर जाते तो उन्हें कपड़े उनके बजट के हिसाब से मिल जाते. ज़ारा ने एक और चालाकी यह की कि वे किसी भी कपड़े का बहुत ज्यादा स्टॉक नहीं रखते थे. इससे लोगों के मन में एक डर रहता था कि अगर आज यह ड्रेस नहीं खरीदी तो कल यह शायद नहीं मिलेगी. इसी कमी (Scarcity) के खेल ने ज़ारा को बहुत जल्दी मशहूर कर दिया.
ज़ारा पर लगे डिजाइन चुराने के आरोप
तरक्की के इस सफर में अमानसियो ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने अपनी कंपनी ‘इंडिटेक्स’ के तहत कई और ब्रांड्स भी शुरू किए, लेकिन ज़ारा हमेशा उनका सबसे चमकता हुआ सितारा रहा. जब ज़ारा स्पेन से बाहर निकलकर बाकी देशों में पहुंचने लगा, तो दुनिया हैरान रह गई. बड़े-बड़े फैशन डिजाइनर ज़ारा पर आरोप लगाने लगे कि वे उनके डिजाइन चुराते हैं, लेकिन अमानसियो को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था. उनका मकसद साफ था कि आम आदमी को भी अमीर दिखने का हक है.
दुनियाभर में घूमते रहते हैं ज़ारा के डिजाइनर
ज़ारा के बारे में एक रोचक किस्सा यह भी है कि उनके डिजाइनर्स पूरी दुनिया में घूमते रहते हैं. वे सड़कों पर, क्लबों में और पार्टीज में देखते हैं कि लोग क्या पहन रहे हैं. जैसे ही उन्हें कोई नया ट्रेंड दिखता है, वे उसका स्केच बनाते हैं और तुरंत स्पेन भेज देते हैं. वहां मौजूद फैक्ट्रियों में रातों-रात कपड़ा तैयार होता है और दुनियाभर के स्टोर्स में पहुंचा दिया जाता है. इसी रफ्तार की वजह से ज़ारा ने दुनिया के सबसे बड़े ब्रांड्स को पीछे छोड़ दिया.
बिल गेट्स से भी अमीर हो गए थे ओर्टेगा
आज ज़ारा दुनिया के लगभग हर बड़े शहर में मौजूद है और इसके हजारों स्टोर हैं. अमानसियो ओर्टेगा, जो कभी डिलीवरी बॉय हुआ करते थे, आज दुनिया के सबसे अमीर व्यक्तियों की सूची में शामिल हैं. एक वक्त ऐसा भी आया था जब उन्होंने बिल गेट्स को पीछे छोड़ते हुए दुनिया के सबसे अमीर आदमी का खिताब हासिल किया था. अभी की बात करें तो फोर्ब्स के मुताबिक अमानसियो की नेट वर्थ 143.5 बिलियन डॉलर है. रुपयों में – 1,30,14,80,42,50,000 (13 लाख करोड़ से अधिक.) इतनी दौलत होने के बावजूद अमानसियो एक बहुत ही सादा जीवन जीते हैं. उन्हें लाइमलाइट से दूर रहना पसंद है और वे आज भी अपनी कंपनी के कैफेटेरिया में अपने कर्मचारियों के साथ ही खाना खाते हैं.
यह भी पढ़ें: सक्सेस स्टोरी: 80 रुपये मजदूरी से 8 करोड़ की आय तक का सफर, सातवीं पास शख्स की ऐसे पलटी किस्मत

Editor in Chief






