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    Home»Featured»6 साल की मासूम से दुष्कर्म के मामले में आरोपी को फांसी की सजा, 56 दिनों में आया 46 पन्नों का फैसला..लेकिन बचने के खुले हैं अब भी कई रास्ते
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    6 साल की मासूम से दुष्कर्म के मामले में आरोपी को फांसी की सजा, 56 दिनों में आया 46 पन्नों का फैसला..लेकिन बचने के खुले हैं अब भी कई रास्ते

    Deepak SahuBy Deepak SahuJanuary 8, 2026
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    n69605297617678317568948f70fe218c14e3c25db2e77bc38ae1d4f4cf2b4fe628c9227268ab0b40a9605f
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    बांदा/स्वराज टुडे: यूपी के बांदा जिला सत्र विशेष न्यायालय (पॉक्सो) ने एक जघन्य अपराध के मामले में 24 वर्षीय अमित रैकवार को मौत की सजा सुनाई है. उस पर छह साल की बच्ची से दुष्कर्म और हैवानियत का आरोप सिद्ध हुआ है.

    न्यायाधीश प्रदीप कुमार मिश्रा ने 46 पन्नों का फैसला सुनाते हुए कहा कि दोषी को मरते दम तक फंदे से लटका कर रखा जाए. इसके बाद उन्होंने कलम की निब तोड़ दी. न्यायधीश ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे जघन्य अपराध करने वालों के लिए समाज में कोई स्थान नहीं है. यह सनसनीखेज घटना 25 जुलाई 2025 को कालिंजर थाना क्षेत्र के एक गांव में हुई थी. दोषी अमित रैकवार स्कूल से लौट रही छह साल की बच्ची को फुसलाकर अपने घर ले गया था. पुलिस रिपोर्ट के अनुसार, आरोपी ने बच्ची को गुटखा मंगाने के बहाने रोका और फिर घर ले जाकर दरिंदगी की सारी हदें पार कर दीं.

    दुष्कर्म के दौरान बच्ची के शरीर पर दांतों से काटने के कई निशान पाए गए और मेडिकल जांच में पता चला कि पीड़िता के शरीर में कई जगहों पर गंभीर चोटें थीं. पुलिस ने वारदात के बाद ही देर रात अमित रैकवार को मुठभेड़ के दौरान गिरफ्तार कर लिया. तीन दिन बाद पुलिस ने उसे जेल भेजा था. सात अक्टूबर 2025 को कालिंजर पुलिस ने न्यायालय में चार्जशीट दाखिल की, जिसमें पॉक्सो एक्ट की धारा छह और भारतीय नवीन दंड संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए गए.

    56 दिन में आया फैसला

    12 नवंबर को आरोप तय होने के बाद मुकदमा शुरू हुआ. बचाव पक्ष ने सबूतों की कमी का हवाला दिया लेकिन, अदालत ने उनकी दलीलों को खारिज कर दिया. कुल 56 दिनों तक चली सुनवाई के दौरान 10 गवाह पेश किए गए. इनमें पीड़िता का इलाज करने वाले तीन डॉक्टरों का पैनल, फॉरेंसिक, डीएनए, मेडिकल रिपोर्ट और बीएनएसएस की धारा 180 व 183 के तहत दर्ज बयान शामिल थे.

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    मौत की सजा को ही न्यायोचित बताया

    इन सभी सबूतों ने आरोपी को पुख्ता तौर पर दोषी साबित किया. सरकारी अधिवक्ता कमल सिंह ने कहा कि आरोपी ने मासूम को पहले बहलाया, फिर घर में ले जाकर दुष्कर्म किया. अधिवक्ता ने इस मामले को रेयरेस्ट ऑफ रेयर श्रेणी में बताते हुए मौत की सजा को ही न्यायोचित बताया. वहीं पुलिस अधीक्षक पलास बंसल ने पुलिस की कार्यवाही की सराहना की है.

    फाँसी की सजा तो मिलती है लेकिन कभी जारी नहीं होता डेथ वारंट

    निर्भया कांड के बाद दुष्कर्म और हत्या के मामले में कानून को और सख्त बना दिया गया, जिसमें फाँसी या उम्रकैद की सजा का प्रावधान है. ऐसे संगीन मामलों की जल्द कार्रवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट की भी स्थापना की गई. लेकिन हैरानी की बात है कि निर्भया कांड के बाद ऐसे अपराधों में कोई कमी नहीं आई। दुष्कर्मियों को एक तो सजा सुनाने में काफी लंबा समय लग जाता है. और अगर फैसला आ भी गया तो उसको अमली जामा पहनाने में कई अड़चने सामने आ जाती है.

    इस मामले में आरोपी अमित रैकवार को फांसी की सजा तो सुना दी गई है लेकिन इस सजा से बचने के लिए उसके पास अभी भी कई विकल्प खुले हैं.

    फांसी की सजा मिलने के बाद भी फांसी न होने का कारण

    दुष्कर्मियों को फांसी की सजा मिलने के बाद भी फांसी न होने के कई कारण हैं। इनमें से कुछ प्रमुख कारणों में शामिल हैं:
    ● दया याचिका की प्रक्रिया : जब किसी दोषी को फांसी की सजा सुनाई जाती है, तो उसके पास दया याचिका दायर करने का विकल्प होता है। इस याचिका पर निर्णय होने तक फांसी नहीं दी जा सकती है। नए कानून के अनुसार, दया याचिका खारिज करने के निर्णय को कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती, लेकिन यह प्रक्रिया अभी भी समय लेती है।
    ● अदालतों में लंबित मामले : अदालतों में लंबित मामलों की संख्या अधिक होने के कारण फांसी की सजा की पुष्टि होने में लंबा समय लग सकता है। इसके अलावा, दोषी के वकील फैसले के खिलाफ अपील कर सकते हैं, जिससे और अधिक देरी हो सकती है।
    ● सबूतों की कमी और जांच में खामियां : कई मामलों में, पुलिस जांच में खामियां और सबूतों की कमी के कारण दोषियों को सजा नहीं मिल पाती है। इसके अलावा, गवाहों के बयान बदलने और पीड़ित के परिवार को धमकी मिलने के कारण भी मामले कमजोर हो सकते हैं।
    ● फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलना: कई मामलों में, अदालतें फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल देती हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि दोषी ने अपराध के समय कम उम्र में किया था, या फिर उसने अपने अपराध के लिए पश्चाताप किया है।
    ● मानवीय अधिकारों का उल्लंघन : फांसी की सजा को लेकर मानवाधिकार संगठनों और अदालतों में बहस होती रहती है। कई बार फांसी की सजा को मानवाधिकारों का उल्लंघन माना जाता है, जिससे इसकी सजा में देरी हो सकती है।

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    इन कारणों के अलावा, फांसी की सजा देने की प्रक्रिया भी बहुत जटिल होती है। इसमें कई चरण होते हैं, जैसे कि डेथ वारंट जारी करना, फांसी की तारीख तय करना, और फांसी देने के लिए जेल प्रशासन की तैयारी। इन्हीं सब कारणों से यह कहा जा सकता है कि दुष्कर्मियों को फांसी की सजा सुनाना अलग बात है और फांसी पर लटका देना अलग ।

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