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    Home»Featured»धर्म के आड़ में अपनी असफलताओं को छिपाती सरकारें और कर्तव्यों से विमुख होते जनप्रतिनिधि..
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    धर्म के आड़ में अपनी असफलताओं को छिपाती सरकारें और कर्तव्यों से विमुख होते जनप्रतिनिधि..

    Deepak SahuBy Deepak SahuJanuary 2, 2025
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    छत्तीसगढ़
    बिलासपुर/स्वराज टुडे: भारत की अर्थव्यवस्था उम्मीद से अधिक धीमी हो गई, वित्त वर्ष 2024-25 की दूसरी तिमाही में जीडीपी वृद्धि उम्मीद से बहुत कम 5.4% रही। वित्त वर्ष 2024-25 की दूसरी तिमाही में वास्तविक जीडीपी विस्तार 5.4% रहा, जबकि वित्त वर्ष 2023-24 की इसी तिमाही में 8.1% की वृद्धि हुई थी।महंगाई डायन बनी हुई है महंगाई से मध्यम और निम्न आय वर्ग की क्रय शक्ति कम हो गई, जिसका असर खपत पर पड़ा है इसने लोगों के खर्च करने पर लगाम लगा दी सीधा सादा अर्थ गणित है खपत कम होगी तो मांग कम होगी, मांग कम होगी तो उत्पादन कम होगी और उत्पादन कम होगी तो महंगाई बढ़ेगी होगा।
    आज रुपया डालर के मुकाबले में कीमत अपने निचले स्तर पर पहुंच गया है और उसके सुधार होने संभावना धीरे धीरे और क्षीण होती जा रही है । भारतीय करेंसी के भाव में लगातार गिरावट आ रही है।कमजोर होते रुपये के नाम एक खराब रिकॉर्ड भी दर्ज हो गया है।पिछले महीने के दौरान रुपये का नाम एशिया की सबसे खराब करेंसी की लिस्ट में दूसरे नंबर पर आया है।
    वियतनाम जैसे छोटा सा देश जो एक दशक तक गृह युद्ध झेलता रहा उसकी करेंसी एशिया में चौथी सबसे मजबूत करेंसी के तौर पर दर्ज हुआ है ।
    रुपया डालर के मुकाबले में रुपए की कीमत अपने निचले स्तर पहुंचने पर 2014 के आम चुनावों में प्रधानमंत्री ( मुख्यमंत्री गुजरात) के प्रधानमंत्री बनने के पूर्व का वह बयान जिसने उन्होंने कहा था कि , ”डॉलर मजबूत, रुपया कमज़ोर होता जा रहा है. विश्व व्यापार में भारत टिक नहीं पाएगा. दिल्ली की सरकार जवाब नहीं दे पा रही है. हमारे अड़ोस-पड़ोस के देशों में डॉलर के मजबूत होने से कोई दिक्कत नहीं हो रही है. प्रधानमंत्री जी, देश ये जानना चाहता है कि आज अकेला हिंदुस्तान का रुपया डॉलर के मुकाबले रुपया क्यों गिरता ही चला गया…गिरता ही चला गया.” ।
    लोकसभा में बोलते हुए दिवंगत सुषमा स्‍वराज ने कहा था कि ‘रुपया केवल एक कागज का टुकड़ा नहीं होता। रुपया केवल एक करेंसी नहीं होती, इस करेंसी के साथ देश की प्रतिष्ठा जुड़ी हुई होती है और जैसे-जैसे करेंसी गिरती है, देश की प्रतिष्ठा गिरती है।’

    यह भी पढ़ें :  चित्रा टॉकीज के संचालक एवं भाजपा जिलाध्यक्ष गोपाल मोदी ने की अनुकरणीय पहल, 'हनुमान अंश' फ्री स्क्रीनिंग देखने प्रेस क्लब कोरबा के पत्रकारों को सपरिवार दिया न्यौता

    अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत के कुल बेरोजगारों में 80 फीसदी युवा हैं. ‘द इंडिया इंपलॉयमेंट रिपोर्ट 2024′ के मुताबिक पिछले करीब 20 सालों में भारत में युवाओं के बीच बेरोजगop 30 फीसदी बढ़ चुकी है. साल 2000 में युवाओं में बेरोजगारी दर 35.2 फीसदी थी जो 2022 में बढ़कर 65.7 फीसदी हो गई.
    अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और इंस्टिट्यूट ऑफ ह्यूमन डिवेलपमेंट (आईएचडी) ने मिलकर यह रिपोर्ट तैयार की है. रिपोर्ट कहती है कि हाई स्कूल या उससे ज्यादा पढ़े युवाओं में बेरोजगारी का अनुपात कहीं ज्यादा है.

    पिछले क़रीब तीन दशकों में कृषि और ग्रामीण भारत में जो दिक़्क़तें बढ़ती गईं उसके ख़िलाफ़ देश के किसानों में लगातार नाराज़गी घर करती जा रही है।
    खेती से लगातार कम होती आमदनी, आय के दूसरे विकल्पों का सामने नहीं होना और कामकाज के दूसरे विकल्पों के मुक़ाबले खेती किसानी की हालत लगातार कमज़ोर होते देख जो बेचैनी बढ़ रही थी, वही बेचैनी और गुस्सा अब आंदोलनो के ज़रिए सामने आ रहा .
    पांच साल पहले सरकार ने किसानों को 2022 तक उनकी आय दो गुना करने का वादा किया था। आय तो दुगना नहीं पर खर्च जरूर दुगना से भी ज्यादा हो गया है ।

    विपक्ष के द्वारा उठाए जाने वाला जातीय जनगड़ना का मुद्दा यह सामाजिक मुद्दा बनता जा रहा है । यह बीजेपी के लिए गले की फांस बना हुआ है । भारतीय समाज का जातियों में बटना बीजेपी राजनीति सत्ता में बने रहने के लिए एक बाधा के रूप में देखती है क्योंकि जातियों से बाहर निकाल कर धार्मिक मुद्दे पर एक करके उनके राजनीति सत्ता को संबल प्रदान करती है । बीजेपी बहुत अच्छे से जानती ही अगर विपक्ष खास कर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी जातीय जनगणना के मुद्दे को बनाने में सफल होती है तो राजनीतिक सत्ता का सबसे ज्यादा नुकसान उसे ही होने वाला है । वह जानते है कि उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश आदि कई बड़े राज्य उसके हाथ से निकल जाएंगे । 2024 के आम चुनाव बीजेपी को बहुमत न देकर इस ओर इशारा भी कर दिया है ।
    इसी से विचलित होकर योगी द्वारा यह नारा दिया गया कि “”बांटोगे तो काटोगे”” और हेमंत विश्वसर्मा द्वारा इतनी कट्टर भरी बाते करना और नरेंद्र मोदी का उनके बयानों बार खुला समर्थन करना या मौन होकर समर्थन करना धार्मिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देना अपने राजनीतिक सत्ता को बनाए रखना का तरीका अपना लिया है ।

    यह भी पढ़ें :  PSSOU के दो अहम MOU, शिक्षा से जनजातीय शोध तक बढ़ेगा सहयोग...अकादमिक गतिविधियों, संयुक्त अनुसंधान, डिजिटल शिक्षा और जनजातीय विषयों पर अध्ययन को मिलेगा नया आधार

    ऐसे में सबसे आसान तरीका है इन सवालों से बचने का की धर्म का आड़ लेकर राजनीति की जाय .. आप समझ सकते है यह तरीका कितना सरल है कि जब देश प्रधानमंत्री खुद आम चुनावों में या राज्य के चुनावों संबोधित करते हुए एक धर्म के लोगों के लिए यह कहने लगे कि उनकी पहचान कपड़ों से की जा सकती है, अगर कांग्रेस सत्ता में आती है तो मंगलसूत्र छीन लेंगे आदि।

    बुनियादी सवाल क्या है डांवाडोल होती अर्थ व्यवस्था, डालर के मुकाबले में गिरता रुपया, हिमालय से बड़ी बरोजगारी, दम तोड़ती किसानी, विपक्ष के द्वारा उठाए जाने वाला जातीय जनगड़ना का सामाजिक सवाल और विफल होती विदेश नीति ।
    यहीं है वर्तमान का मूल मुद्दा..।
    ये ही बुनियादी सवाल है जिनसे बचने हेतु वर्तमान सरकार और उसमें शामिल अलग अलग पार्टियों के जन प्रतिनिधि नए नए सुगुंफा छोड़ते रहते है जिससे समाज वैमनस्य फैला सके और समाज को मूल मुद्दे भटका सके ।
    वो कहते है न जितना कुरेदो गे जख्म उतने ही हरे होंगे ताजे होंगे.. उसी का हिस्सा है गली गली मस्जिदों के नीचे शिवलिंगों का खोजें जाना।
    सत्ता के लालच ने इन राज नेताओं कल की भविष्य के प्रति अव्यवहारिक बना दिया ।
    वे भूल गए है कि उनके द्वारा बोले गए शब्दों से सामाजिक तानाबाना पर क्या प्रभाव पड़ता है।
    वे भूल जाते है “”धर्म राजनीतिक हथियार बनकर लोकतंत्र को लहूलुहान कर रहा है””।

    (यह लेखक का निजी विचार है)
    राकेश प्रताप सिंह परिहार ( कार्यकारी अध्यक्ष अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति , पत्रकार सुरक्षा कानून के लिए संघर्षरत)

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    Deepak Sahu

    Editor in Chief

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