दोनों नन बेकसूर, मारपीट कर झूठा बयान दिलवाया; छग के धर्मांतरण मामले में पीड़िता का सनसनीखेज दावा

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दुर्ग/स्वराज टुडे: छत्तीसगढ़ में मानव तस्करी और जबरन धर्मांतरण के जिस मामले में केरल की दो ननों को गिरफ्तार किया गया है, उसकी पीड़िता ने अपने बयान से पलटते हुए सनसनीखेज दावा किया है। उसका कहना है कि वह अपनी मर्जी से नौकरी करने के लिए ननों के साथ जा रही थी, इसी दौरान रेलवे स्टेशन पहुंचे बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने उनके साथ मारपीट करते हुए उन्हें झूठा बयान देने पर मजबूर किया था।

आरोप लगाने वाली युवती का नाम कमलेश्वरी प्रधान है, जिसका दावा है कि पुलिस ने भी उसका बयान ठीक से दर्ज नहीं किया। वहीं जबरन धर्मांतरण के आरोपों पर उसने कहा कि वह खुद को ईसाई मानती है और उसका परिवार बीते चार-पांच सालों से इसी धर्म का पालन कर रहा है।

नारायणपुर जिला मुख्यालय से करीब 10 किमी दूर कुकुराझोर गांव में रहने वाली 21 वर्षीय युवती का कहना है कि हम अपनी मर्जी से मिशन अस्पताल में काम करने के लिए भोपाल जा रही थीं। इसी बीच दुर्ग रेलवे स्टेशन पर आए बजरंग दल के लोग हमें पकड़कर ले गए और तीनों के खिलाफ झूठा मामला बनवा दिया। उन्होंने मेरे साथ मारपीट करते हुए मुझे डराया भी। युवती के माता-पिता जो कि किसान हैं, उन्होंने भी दावा किया कि मामले में गिरफ्तार की गई दो नन और एक अन्य व्यक्ति निर्दोष हैं और उन्हें जेल से रिहा किया जाना चाहिए।

बजरंग दल ने कहा- सीसीटीवी में सब रिकॉर्ड है

हालांकि, बजरंग दल की दुर्ग इकाई के संयोजक रवि निगम ने संगठन पर लगे सभी आरोपों से इनकार किया है। पीटीआई से बात करते हुए रवि निगम ने कहा, ‘हमने ना तो किसी को धमकाया है और ना ही किसी के साथ मारपीट की है। रेलवे स्टेशन पर सीसीटीवी कैमरे भी लगे हुए हैं, जिनकी जांच करने पर सच्चाई बाहर आ जाएगी।’

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केरल की नन प्रीति मैरी और वंदना फ्रांसिस को सुखमन मंडावी के साथ 25 जुलाई को राज्य के दुर्ग रेलवे स्टेशन पर राजकीय रेलवे पुलिस (जीआरपी) ने गिरफ्तार किया था। यह कार्रवाई बजरंग दल के एक स्थानीय पदाधिकारी की शिकायत पर की गई थी, जिसमें ननों पर आदिवासी बहुल नारायणपुर जिले की तीन महिलाओं का जबरन धर्म परिवर्तन कराने और उनकी तस्करी करने का आरोप लगाया गया था।

अस्पताल में नौकरी करने जा रहे थे साथ

नारायणपुर के अबूझमाड़ क्षेत्र में स्थित अपने गांव कुकराझोर में पीटीआई से बात करते हुए कमलेश्वरी ने दावा किया कि हम तीनों लड़कियों की तस्करी नहीं की जा रही थीं, बल्कि हम तो अपनी इच्छा और अपने माता-पिता की सहमति से उनके साथ जा रही थीं।

युवती ने बताया, ‘मैं अपने माता-पिता की सहमति से ननों के साथ आगरा जा रही थी। वहां से हम भोपाल जाने वाले थे जहां हमें एक ईसाई अस्पताल में काम दिया जाना था। हमें भोजन, कपड़े और रहने की जगह के साथ 10,000 रुपए प्रति महीना वेतन भी देने का वादा किया गया था।’

दोनों ननों से पहली बार स्टेशन पर मिली थी’

कमलेश्वरी ने बताया कि वह, मंडावी और जिले के ओरछा क्षेत्र की दो अन्य महिलाएं 25 जुलाई की सुबह दुर्ग स्टेशन पहुंचे थे। उसने कहा, ‘जिन ननों से मैं पहले कभी नहीं मिली थी, वे कुछ घंटों बाद वहां पहुंचीं। इसी दौरान बजरंग दल का एक व्यक्ति ने हमारे पास आया, और अन्य लोग भी उसके साथ आ गए। उन्होंने हमें धमकाना, गालियां देना और मारपीट करना शुरू कर दिया।’

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ज्योति शर्मा नाम की महिला ने थप्पड़ मारकर धमकाया

युवती ने आरोप लगाते हुए आगे कहा कि, ‘इसके बाद रेलवे पुलिस वहां पहुंची और हमें पुलिस स्टेशन (जीआरपी) ले जाया गया, जहां ज्योति शर्मा नाम की एक महिला ने मुझे थप्पड़ मारा और बयान बदलने की धमकी दी। वह खुद को हिंदू संगठन की कार्यकर्ता बता रही थी। उसने मुझसे कहा कि मैं कहूं कि मुझे जबरदस्ती ले जाया गया है। उसने कहा कि अगर मैंने ऐसा नहीं किया, तो मेरे भाई को जेल में डाल दिया जाएगा और पीटा जाएगा।’

उसने यह भी दावा किया कि पुलिस ने उसका वास्तविक बयान नहीं लिया और ऐसी बातें लिख रही थी जो उसने कभी नहीं कही थीं। उसने कहा, ‘जब मैंने बोलने की कोशिश की, तो उन्होंने मुझे चुप रहने को कहा और पूछा कि क्या मैं घर जाना चाहती हूं।’

नारायणपुर में 250 रुपए दिहाड़ी पर काम करती थी

दसवीं कक्षा तक पढ़ी कमलेश्वरी ने बताया कि वह एक दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करती थी और 250 रुपए प्रतिदिन कमाने के लिए रोजाना 10 किलोमीटर साइकिल चलाकर नारायणपुर जिला मुख्यालय जाती थी। आगे उसने कहा कि ‘सुखमन मंडावी ने मुझे इस नौकरी के बारे में बताया था, वह मेरे लिए भाई जैसे हैं। हमारी मुलाकात चर्च के ज़रिए हुई थी। इससे पहले, इलाके की कई महिलाएं अस्पतालों में काम करने जाती थीं। सुखमन की एक बहन भी एक ईसाई अस्पताल में काम करती थी और बाद में वापस लौट आई।’

धर्मांतरण के आरोपों को खारिज करते हुए, उसने कहा, ‘मेरा परिवार पिछले चार-पांच सालों से ईसाई धर्म का पालन कर रहा है। मेरी मां बीमार रहती थीं। हम उन्हें ‘चंगाई’ सभा (चिकित्सा सभा) में ले जाते थे, उसके बाद से उनकी तबियत ठीक होने लगी, जिसके बाद हमने इस धर्म का पालन करना शुरू कर दिया।’ युवती ने दावा किया कि दोनों कैथोलिक नन और मंडावी निर्दोष हैं और इसके साथ ही उसने राज्य सरकार से उन्हें रिहा करने की अपील की।

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दीपक साहू

संपादक

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