उत्तरप्रदेश
प्रयागराज/स्वराज टुडे: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सुनवाई करते हुए एक अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि पश्चिमी विचारों और लिव-इन-रिलेशनशिप की अवधारणा के प्रभाव में युवाओं में विवाह के बिना साथ रहने वाली सोच बढ़ रही है। लेकिन जैसे ही ऐसे संबंध टूटते हैं, तो एफआईआर दर्ज करा दी जाती है। कानून महिलाओं के पक्ष में हैं, इसलिए पुरुषों को उन कानूनों के आधार पर दोषी ठहराया जाता है।
हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी न्यायमूर्ति सिद्धार्थ एवं न्यायमूर्ति प्रशांत मिश्र की प्रथम खंडपीठ ने विशेष न्यायाधीश पॉक्सों एक्ट महराजगंज की ओर से चंद्रेश को दी गई उम्रकैद समेत दोषसिद्धि के आदेश को रद्द करते हुए की।
अपील करने वाले चंद्रेश को आईपीसी की धारा 363, 366 और 323, पॉक्सो एक्ट की धारा 6 और एससी-एसटी एक्ट की धारा 3(2)(5) के तहत दोषी ठहराया गया था। अभियोजन पक्ष का कहना था कि आरोपी चंद्रेश शिकायतकर्ता की नाबालिग बेटी को बहला-फुसलाकर बेंगलुरु लेकर चला गया। यहां उसने नाबालिग लड़की के साथ शारीरिक संबंध बनाए।
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पाया कि पीड़िता बालिग थी और विशेष अदालत ने अस्थि परीक्षण के दौरान रिपोर्ट पर ठीक से विचार नहीं किया गया, जिसमें लड़की की उम्र 20 साल साबित हुई थी।
कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष की ओर से दिए गए स्कूल रिकॉर्ड किशोर न्याय नियमों के अनुसार दस्तावेजी रूप में मान्य नहीं थे। कोर्ट ने कहा कि लड़की ने अपने बयान में खुद स्वीकार किया कि वह अपनी इच्छा से गई थी। बेंगलुरु में लड़की ऐसे इलाके में अपीलार्थी के साथ रही जहां कई घर थे। लड़की के साथ उसकी सहमति से शारीरिक संबंध बनाए थे। यहां लड़की छह माह तक लाभार्थी के साथ रही थी।
हाई कोर्ट ने कहा कि आईपीसी की धारा 363 और 366 के तहत दोषसिद्धि कानून के अनुसार बिल्कुल अनुचित थी, क्योंकि पीड़िता बालिग थी और अपनी मर्जी से गई थी। पीड़िता बालिग थी तो पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत अपीलार्थी को दोषी ठहराना गलत है। हाई कोर्ट ने अपीलार्थी की अपील को स्वीकार करते हुए उसकी सजा को रद्द कर दिया।

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