वैचारिक शून्यता का प्रदर्शन: अपने पुरखों के नाम पर ‘यूनिटी मार्च’ क्यों नहीं? : राकेश प्रताप सिंह परिहार

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छत्तीसगढ़
बिलासपुर/स्वराज टुडे: आज जब देश की सत्तारूढ़ पार्टी और उसका वैचारिक जनक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), ‘एकता यात्रा’ या ‘यूनिटी मार्च’ निकालता है, तो एक बुनियादी सवाल मन में कौंधता है: आखिर यह मार्च संघ के अपने वैचारिक पुरखों—गुरु गोलवलकर या डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी—के नाम पर क्यों नहीं होता?

​किसी भी बौद्धिक समाज में यह सर्वमान्य है कि जब कोई वैचारिक समूह अपने वास्तविक पुरखों को सामने रखने से हिचकता है और लगातार दूसरों के महान नेताओं को ‘अपना’ साबित करने में ऊर्जा लगाता है, तो यह उसकी वैचारिक शून्यता (Intellectual bankruptcy) का स्पष्ट संकेत होता है। यह एक ऐसी मजबूरी है, जहाँ आपके पास ‘दिखाने, समझाने और बताने’ के लिए अपने इतिहास में कुछ ठोस नहीं है।

वैचारिक आयात की मजबूरी

​राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके राजनीतिक स्वरूप—जनसंघ से लेकर आज की भारतीय जनता पार्टी (BJP) तक—का यही हाल है। विदेश दौरों पर देश के सर्वोच्च नेता भले ही विश्व पटल पर भारत का प्रतिनिधित्व करते हों, लेकिन वे अपने मूल वैचारिक पुरखों का उल्लेख करने के बजाय, छोटे मन से ही सही, दूसरों के वैचारिक पुरखों के सामने शीश झुकाने को मजबूर होते हैं।
​यह वैचारिक आयात (Intellectual Import) समय-समय पर देखने को मिलता है। कभी नेताजी सुभाष चंद्र बोस, तो कभी ‘लौह पुरुष’ सरदार वल्लभ भाई पटेल को आगे रखकर, देश की जनता को भ्रमित करने का प्रयास किया जाता है। हालिया ‘यूनिटी मार्च’ में सरदार पटेल को कांग्रेसी नेता न बताकर, उन्हें ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक’ विचारों का नेता साबित करने की कोशिश की गई, जो इतिहास का एक भोंडा विरूपण है।

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सरदार पटेल और RSS: कड़वी सच्चाई

​इतिहास के पन्नों में झाँकने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि जिन महापुरुषों को RSS आज अपना पुरोधा बता रहा है, उनका संघ की विचारधारा से कोई संबंध नहीं था।
​महात्मा गांधी की हत्या के बाद, तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ही थे, जिन्होंने 4 फरवरी 1948 को RSS पर प्रतिबंध लगा दिया था।

प्रतिबंध का कारण सीधा था: पटेल ने RSS के भाषणों को “सांप्रदायिक जहर” से भरा बताया, जिसके परिणामस्वरूप गांधी जी की  “अमूल्य जान” का बलिदान हुआ। पटेल ने स्पष्ट माना कि भले ही हत्या में RSS का सीधा हाथ न हो, लेकिन उसकी गतिविधियों ने देश में घृणा और हिंसा का माहौल पैदा किया।
​संघ पर से प्रतिबंध हटाना भी संघ की देशभक्ति का प्रमाण नहीं, बल्कि एक मजबूरी थी। सरदार पटेल ने यह प्रतिबंध सशर्त हटाया था। शर्तों में प्रमुख थीं:  संघ द्वारा लिखित संविधान अपनाना, हिंसा का त्याग करना, भारत के संविधान का पालन करना और सबसे महत्वपूर्ण, राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगा) को स्पष्ट रूप से स्वीकार करना।

जब तत्कालीन संघ प्रमुख एम. एस. गोलवलकर ने ये शर्तें लिखित में स्वीकारीं, तब जुलाई 1949 में प्रतिबंध हटा। यह समझौता संघ के लिए अस्तित्व बचाने की मजबूरी थी, न कि पटेल का वैचारिक समर्थन।

नेताजी बोस: धर्मनिरपेक्षता के प्रतीक

​दूसरा वैचारिक पुरोधा, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, तो RSS की विचारधारा के सीधे विपरीत खड़े थे। नेताजी एक कट्टर  धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवादी और समाजवादी थे। उन्होंने अपनी पुस्तक “द इंडियन स्ट्रगल”  में हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग दोनों को समान रूप से सांप्रदायिक संगठन माना।
​बोस ने हिंदू महासभा/RSS की उस नीति का कड़ा विरोध किया, जिसके तहत उन्होंने ब्रिटिश सरकार के युद्ध प्रयासों में सहयोग देने की नीति अपनाई थी, जबकि बोस ने इसे राष्ट्र के साथ धोखा माना। उनकी आज़ाद हिंद फ़ौज (INA)  हिंदू, मुस्लिम और सिखों की एकता का उत्कृष्ट उदाहरण थी, जो उनकी सर्व-धर्म समभाव की विचारधारा को दर्शाती है।

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आत्म-चिंतन की आवश्यकता

​यह स्पष्ट है कि जिन दो महापुरुषों को RSS/BJP अपने विचारों का पुरोधा बताती है, उनका संघ की सांप्रदायिक विचारधारा से कोई तालमेल नहीं था। उनका स्पष्ट मानना था कि RSS या हिंदू महासभा जैसे संगठन देश की आज़ादी के रास्ते में एक बड़ी बाधा हैं।
​संघ और उसके राजनीतिक दल को वैचारिक उधार लेना बंद करना चाहिए। यदि वे सचमुच में अपनी विचारधारा के प्रति ईमानदार हैं, तो उन्हें अपने वास्तविक पुरखों—गोलवलकर जी या मुखर्जी जी—के नाम पर साहस के साथ ‘यूनिटी मार्च’ निकालना चाहिए। ​दूसरों के महान नेताओं को चुराकर अपना बनाने की यह कोशिश अंततः आत्म-वंचना और वैचारिक धोखे के सिवा कुछ नहीं है, जो देश के बौद्धिक समाज को भ्रमित नहीं कर सकती।

यह लेखक के निजी विचार है

राकेश प्रताप सिंह परिहार (राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति, पत्रकार सुरक्षा कानून के लिए संघर्षरत)

दीपक साहू

संपादक

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