कांग्रेस के जहाज को डूबने से बचा रहे कमलनाथ और गहलोत जैसे नेता, आखिर कब तक धृतराष्ट्र और गांधारी बना रहेगा कांग्रेस आलाकमान

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*एक के बाद एक सक्रिय नेताओं को किनारे लगाने से हो सकता है पार्टी को बड़ा संकट।

*विपक्षी पार्टी के नेता मानते हैं कमलनाथ का लोहा, सभी मानते हैं उनके व्यक्तित्‍व को सरल एवं नेक ।

*कांग्रेस खत्‍म नहीं हुई है, जरूरत वरिष्‍ठ नेताओं को पहचानने की है ।

लोकसभा चुनाव में जिन-जिन प्रदेशों में या क्षेत्रों में कांग्रेस पार्टी या कांग्रेस उम्‍मीदवार मजबूत स्थिति में नजर आ रहे हैं वह अपने व्‍यक्तिगत काबिलियत के बल पर हैं। जैसे मध्‍यप्रदेश में 5-6 सीटों पर कांग्रेस जीतने की दावेदारी कर रही है तो वह कमलनाथ, दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं के कद के कारण है। यह नेता अपने-अपने क्षेत्रों में तो मजबूत हैं ही साथ ही पूरे प्रदेश में इनका प्रभाव है। वैसा ही कुछ राजस्‍थान में अशोक गहलोत, सचिन पायलट के कारण है। क्‍योंकि यह जननेता हैं। इनकी प्रभावी छबि है। यह जन-जन से जुड़े नेता हैं और इनके नाम से लोग पार्टी से जुड़ते हैं। यदि पार्टी हाईकमान ऐसी ही जननेताओं को दरकिनार करेंगी और बड़ी जिम्‍मेदारी नहीं देगी तो नुकसान कांग्रेस को ही होगा।
अब तक हुए तीन चरणों के चुनाव में जहां सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी अपनी जीत को लेकर आश्वस्त हैं वहीं, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस पूरी तरह से सुस्त अवस्था में बैठ गई है। कांग्रेस दल और नेताओं को देखकर मानो ऐसा लगता है जैसे उन्होंने पहले से ही दोनों हाथ खड़े कर दिये हैं। वे शायद यही सोच रहे होंगे चाहे हम जितनी भी उठा पटक कर लें लेकिन आयेगा तो मोदी ही। सवाल यह है कि कांग्रेस जैसी शक्तिशाली और समर्थवान पार्टी के नेताओं के दिमाग में यह विचार उठ क्यों रहे हैं? आखिर पिछले दस वर्षों में प्रधानमंत्री मोदी ने देश की जनता पर ऐसा कौन सा जादू कर दिया कि लोग अब केवल भाजपा की ओर झुक रहे हैं। सिर्फ लोग ही नहीं बल्कि कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता, क्षेत्रीय नेता, राज्य स्तरीय नेता भी कांग्रेस का साथ छोड़ भाजपा के साथ दामन थामने के लिये निरंतर प्रयास कर रहे हैं। पिछले दो वर्षों में कांग्रेस नेताओं के बीच आये इस असमंजस की सबसे बड़ी वजह है कांग्रेस पार्टी। पार्टी के वरिष्ठ नेता और आलाकमान।
लेकिन यहां एक और सवाल उठता है कि अभी भी कांग्रेस पार्टी खत्‍म नहीं हुई है। आज भी पार्टी में कई ऐसे समर्पित और प्रभावी नेता हैं जो कांग्रेस को जिंदा करने की काबिलियत रखते हैं। जरूरत इस बात की है कि उन्‍हें कुछ करने का जिम्‍मा दिया जाये। पार्टी के अंदर कमलनाथ, अशोक गहलोत जैसे समर्पित नेता हैं जिन्‍होंने अपनी जिंदगी कांग्रेस के लिए समर्पित की है। और आज भी इतने उठापटक के बाद यह नेता और समर्पण भाव से पार्टी की सेवा में लगे हैं।

अभी भी कांग्रेस को खड़ा किया जा सकता है

वर्तमान समय में कहा जा रहा है कि कांग्रेस पार्टी खत्‍म हो गई है। उसके कई नेता पार्टी का दामन छोड़ चुके हैं। लेकिन मेरा निजी नजरिया कहता है कि अभी भी कांग्रेस को बड़े स्‍तर पर खड़ा किया जा सकता है। आज भी पार्टी में कई ऐसे वफादार और समर्पित नेता हैं जो पूरे समर्पण के साथ सेवा कर रहे हैं। लेकिन पार्टी हाईकमान ऐसे नेताओं पर ध्‍यान न देकर बहुत बड़ी भूल कर रही है। पार्टी के कुछ चाटूकार नेताओं ने हाईकमान की आंखों पर ऐसी पटटी बांध दी है कि उन्‍हें कुछ दिख ही नहीं रहा है। आलाकमान को अपनी पटटी खोलनी होगी। चाटूकारों और वफादारों में फर्क समझना होगा।

पार्टी के अस्तित्व पर मंडराता खतरा

मैं इस बात को लेकर इसलिये भी पूरी तरह से आश्वस्त हूं कि पार्टी आलाकमान ने पिछले दो वर्षों में जिस तरह से निर्णय लिये हैं उसने पार्टी के नेताओं के उत्साह को पूरी तरह से जमींदोज कर दिया है। चाहे बात मध्यप्रदेश की हो, राजस्थान की या फिर छत्तीसगढ़ की। मैंने इन तीनों राज्यों को जितना करीबी से देखा है उसे देख मैं यह बात स्पष्ट तौर पर कह सकती हूं कि अगर आज इन तीनों राज्यों में कांग्रेस की हालत खराब है तो इसकी जिम्मेदार भारतीय जनता पार्टी नहीं बल्कि कांग्रेस लीडरशिप है। कांग्रेस के वह नेता हैं जो एसी की चार दीवारी के अंदर बैठे हैं और बड़ी-बड़ी कारों में घूमकर देश में बदलाव की कहानी सुना रहे हैं। इन कहानियों का असर आमजन पर कितना होगा यह तो आने वाले 04 जून को पता चल जायेगा। फिलहाल चिंता इस बात को लेकर है कि अगर कांग्रेस आलाकमान ने अपनी आंखों के ऊपर बंधी पट्टी अभी भी नहीं खोली तो वह दिन दूर नहीं जब कांग्रेस पार्टी के अस्तित्व को खतरा हो जायेगा।

बड़े और अनुभवी नेताओं को बैठाया किनारे

कांग्रेस ही ऐसी पार्टी फिलहाल दिखाई दे रही है जिसने अपने वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं को किनारे बैठा दिया है। इसमें कमलनाथ से लेकर अशोक गहलोत, सचिन पायलट, टीएस सिंहदेव जैसे दिग्गज नेता शामिल हैं। पार्टी के आलाकमान ने कभी भी इनको बुलाकर इनसे बातचीत करने का विचार नहीं किया कि वह अपने विचार बतायें कि पार्टी को आगे कैसे ले जाना है और पार्टी को किस तरह से संचालित करना है। जिन राज्यों में पार्टी की सरकार नहीं है वहां सरकार बनाने के लिये क्या रणनीति होना चाहिए। इन सब पर बात करना भी उचित नहीं समझा। अगर राहुल गांधी, सोनिया गांधी और प्रिंयका गांधी ने सही समझा तो सिर्फ इन नेताओं को किनारे लगाना। खास बात यह है कि इन नेताओं को किनारे लगाया भी तो किसके कहने पर यह बात जानकर भी शायद आश्चर्य लगे। पार्टी आलाकमान को रायशुमारी देने वाले वह नेता हैं जो खुद कभी एक चुनाव नहीं जीते। जयराम रमेश जैसे नेता आज कांग्रेस पार्टी की मिट्टी पलीत करने में जुटे हुए हैं।

इन नेताओं को मिलनी चाहिए बड़ी जिम्मेदारियां

पार्टी आलाकमान को इस बारे में विचार कर एक बार पुनः अपनी रणनीति पर काम करने की आवश्यकता है। पार्टी को चाहिए कि वह कमलनाथ, अशोक गहलोत, टीएस सिंह देव, सचिन पायलट, चरणदास महंत जैसे दिग्गज नेताओं को एकजुट कर पार्टी के अस्तित्व पर मंडरा रहे संकट को दूर करने बारे में विचार करें और इन्हें अपने-अपने प्रदेशों में पार्टी को मजबूती देने की जिम्मेदारी सौंपे। मैं यह नहीं कहती कि पार्टी ने अभी जिन नेताओं को राज्यों में जिम्मेदारी सौंपी है वह इसके काबिल नहीं हैं। लेकिन यह जरूर कहना चाहती हूं कि उन नेताओं को स्थानीय नेता और कार्यकर्ता स्वीकार नहीं कर रहे हैं। ऐसे में जब बात अस्वीकार्यता पर आ जाये तो पार्टी को वही निर्णय लेना उचित होगा जो पार्टी हित में हो। यहां आपसी रंजिश, मनभेद, मतभेद भुलाकर पार्टी को बचाने के बारे में सोचना चाहिए।

यह चुनाव तो लगभग फिसल चुका है

वर्तमान समय में चल रहे लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की उदासीनता और आपसी मनभेद ने पार्टी को किनारे पर लाकर खड़ा कर दिया है। अब तक तीन चरणों का मतदान हो चुका है और पार्टी ने इस बात को कहीं न कहीं स्वीकार कर लिया है कि जिस तरह से मत प्रतिशत सामने आ रहे हैं उस हिसाब से भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर सरकार बनाने के वायदे को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त है। अब केवल समय बचा है तो आगामी दिनों में होने वाले विधानसभा चुनाव में कुछ कर गुजर एक बार फिर पार्टी के झंडे को बुलंद करने का।

कमलनाथ एक अच्छे व्यक्ति हैं: कैलाश विजयवर्गीय

चुनावी राजनीति के इतर विपक्षी भी एक-दूसरे का सम्मान करते हैं। वैसे भी कैलाश विजयवर्गीय प्रदेश के दिग्गज नेता हैं और आज के समय उनके व्यक्तित्‍व के बराबर का नेता मध्यप्रदेश भाजपा में तो नहीं है। लोकसभा चुनाव के ऐलान से पहले तेजी से चली कमलनाथ के बीजेपी के साथ जाने की चर्चा एक बार फिर गर्म है। इस बार कमलनाथ का भाजपा के साथ नाम जोड़ते हुए उन्हीं कैलाश विजयवर्गीय ने तारीफ की है। चुनावी माहौल में सक्रियता बनाए हुए मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने एक कार्यक्रम के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के बारे में बोला की वे एक अच्छे व्यक्ति हैं। अगर वे भाजपा में आते तो उनका स्वागत होता। यहां सवाल पैदा होता है कि जब विपक्ष के वरिष्‍ठ नेता भी कमलनाथ को बेहतर राजनेता और व्‍यक्ति मानते हैं तो कांग्रेस हाईकमान इनको बड़ी जिम्‍मेदारी देने में क्‍यों हिचकिचा रही है।

*विजया पाठक की रिपोर्ट*

दीपक साहू

संपादक

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