इतिहास से गायब कर दी गई रानी रासमणि का नाम, अपने चातुर्य से अंग्रेजों को दी थी पटखनी, प्रसिद्ध दक्षिणेश्वर काली मंदिर का भी करवाया था निर्माण

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अपने सामाजिक कामों की वजह से रानी रासमणि को साल 1994 में भारतीय डाक टिकट में जगह मिली.
हुगली नदी (Hooghly River) में मछली पकड़ने पर टैक्स लगाकर अंग्रेजी हुकूमत ने बड़ी चाल चली. तब रानी रासमणि (how the queen Rashmoni outwitted the East India Company) ने नदी का बड़ा हिस्सा लीज पर ले लिया और उसे लोहे की जंजीरों से घेर दिया. अब अंग्रेज मुसीबत में थे.

ये 1840 की बात है. तब अंग्रेजी हुकूमत देश पर अपनी व्यापारिक नीति का कहर बरपा रही थी. बंगाल भी इससे अछूता नहीं था. वहां ब्रिटिश सरकार ने हुगली नदी में मछलियां पकड़ने पर टैक्स (Hooghly River tax on fishing) लगा दिया. इससे मछुआरों की रोजी-रोटी ठप पड़ गई. अंग्रेजों का तर्क था कि मछलियां पकड़ने के जालों के कारण स्टीमरों के आने-जाने में रुकावट होती है. अब मछुआरों के पास भूखों मरने के अलावा कोई रास्ता नहीं था. कुछ मछुआरे रानी रासमणि (Rani Rashmoni), जिन्हें बांग्ला में राशमोनी कहा जाता था, के पास मदद की अर्जी लेकर पहुंचे.

रानी के पास फरियाद लेकर पहुंचे मछुआरे

रानी रासमणि की हवेली तब कोलकाता (तब कलकत्ता) के बीचोंबीच जनबाजार में हुआ करती थी. मछुआरों ने रानी से मिलकर उन्हें सारी बातें बताईं. ये भी बताया गया कि कैसे वे मदद के लिए पहले कुलीन और बेहद ताकतवर उच्च समुदाय के पास भी गए थे, लेकिन अंग्रेजों से संबंध खराब होने के डर से सबने उन्हें लौटा दिया.

रानी ने मदद के लिए हामी भर दी. लेकिन सवाल था, कैसे?

तब व्यापार में बेहद चतुर इस बंगाली विधवा ने एक अनोखा तरीका निकाला. उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी से एक लीज की. इसके तहत रानी ने कंपनी को 10 हजार रुपए दिए बदले में उन्हें हुगली नदी के किनारे के 10 किलोमीटर हिस्सा मिल गया. लीज पर लिया ये किनारा हुगली का सबसे व्यस्त इलाका था. अब ये रानी का था.

इस बंगाली महिला ने फिर अपने हिस्से के किनारों पर लोहे की मोटे और काफी मजबूत जंजीरें लगवा दीं और जगह को कुछ ऐसे घेर दिया कि वो एक सेपरेट जगह बन गई. रानी ने अब मछुआरों से कहा कि वे यहां आकर मछलियां पकड़ सकते हैं.

यहां से अंग्रेजों की मुसीबत शुरू हुई

स्टीमर लेकर यहां से वहां बिजनेस के लिए आ रहे ब्रिटिश व्यापारी अब बीच में अटकने लगे. कंपनी ने रानी से जबाव मांगा तो उन्होंने कंपनी के साथ अपने करार के कागजात सामने कर दिए. साथ ही कहा कि मछुआरों की आय पर असर से उनकी कमाई पर भी असर हो रहा है और वे यह काम अपने लिए कर रही हैं. काफी निवेदन के बाद रानी रासमणि किसी भी तरह से लोहे के बाड़े हटाने के लिए तैयार नहीं हुई .

आखिरकार अंग्रेजी हुकूमत को ही झुकना पड़ा. वे समझ गए कि रानी ये लीज का नाटक मछुआरों की मदद के लिए किया था. लिहाजा उन्होंने हुगली में मछलियां पकड़ने पर से लगाया भारी-भरकम टैक्स पूरी तरह से हटा लिया. द हिंदू में इस कहानी का विस्तार से जिक्र हुआ है कि कैसे एक विधवा और तथाकथित निचली जाति से आने वाली महिला ने अपने तेज दिमाग से अंग्रेजों के व्यापारिक दिमाग को झटका दे दिया था.

बहुत ही दिलचस्प है रानी रासमणि की कहानी

रानी रासमणि की पूरी कहानी भी कम दिलचस्प नहीं. 28 सितंबर 1793 को केवट समुदाय में जन्मी राममणि के माता-पिता भी मछलियां पकड़ने का काम करते. तब संभ्रांत बंगाली समुदाय में उस समुदाय को खास तवज्जो नहीं मिलती थी, बल्कि साथ उठने-बैठने का भी हक नहीं था.

रासमणि को और भी ज्यादा मुसीबतें देखनी पड़ीं

जब वे 7 साल की थीं, उनकी मां का निधन हो गया. 11 साल की उम्र में शादी करके जिस घर पहुंची, वहां वो तीसरी पत्नी थीं. यानी पारिवारिक तौर पर भी उन्हें काफी समस्याएं हुईं. साथ ही पति बाबू राजचंद्र दास उनसे उम्र में काफी बड़े थे. हालांकि यहां से रानी की आर्थिक स्थिति सुधरी क्योंकि उनके पति जमींदार थे. बाबू राजचंद्र दास ने भी रासमणि के तीक्ष्ण दिमाग को देख उन्हें अपने साथ व्यापार में शामिल कर लिया.

पति की मौत के बाद हार नहीं मानी

पति-पत्नी साथ मिलकर व्यापारिक समझौते किया करते लेकिन ये भी ज्यादा समय तक नहीं चल सका और बाबू राजचंद्र दास की मृत्यु हो गई. तब उस समय की विधवा स्त्रियों की तरह सती होने या फिर घर बैठ जाने की बजाए रानी रासमणि ने जायदाद की देखभाल और उसे बढ़ाने का जिम्मा ले लिया.

समाज सुधार के काम किए

जैसे उन्होंने कोलकाता में कई पक्के घाट बनवाए. सड़कें और बगीचे बनवाए. लेकिन रानी को सबसे ज्यादा याद दो वजहों से किया जाता है. उन्होंने प्रेसिडेंसी कॉलेज (तब हिंदू कॉलेज) की शुरुआत के लिए भारी रकम दान की थी. साथ ही बहुतेरे स्कूल-कॉलेज में बड़ी रकम दान की.

दक्षिणेश्वर काली मंदिर इन्हीं की देन

रानी रासमणि ने लगभग 25 एकड़ जमीन पर भव्य दक्षिणेश्वर काली मंदिर बनवाया. तब तथाकथित निचली जाति से होने के कारण रानी के बनवाए मंदिर में कोई पुजारी तक आने को तैयार नहीं था. बाद में इसी मंदिर के पुजारी रामकृष्ण परमहंस बने थे. फरवरी 1861 को रानी रासमणि का निधन हो गया, हालांकि आज भी काली मंदिर समेत कई वजहों और अपनी तीक्ष्ण बुद्धि के कारण रानी का नाम कोलकाता में जब-तब लिया जाता है.

इतिहास से क्यों गायब है इतनी बड़ी हस्ती का नाम

यहां सवाल उठना लाजिमी है कि गरीब परिवार में जन्मी और अपनी बुद्धि व चातुर्य से फर्श से अर्श तक पहुंचने वाली रानी रासमणि का नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज क्यों नहीं है । रानी रासमणि, बंगाल में नवजागरण काल की एक प्रभावशाली व्यक्तित्व थीं। वे एक सामाजिक कार्यकर्ता, एवं कोलकाता के जानबाजार की जनहितैषी ज़मीनदार के रूप में प्रसिद्ध थीं। वे दक्षिणेश्वर काली मंदिर की संस्थापिका थीं, एवं नवजागरण काल के प्रसिद्ध दार्शनिक एवं धर्मगुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस की मुख्य पृष्ठपोषिका भी हुआ करती थी। लेकिन आज की पीढ़ी शायद ही इस महान विभूति के नाम से वाकिफ होगी।

दीपक साहू

संपादक

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