अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस: नारी सशक्तिकरण वरदान या अभिशाप – डॉ सुषमा पांडेय

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नारी सशक्तिकरण अवधारणा का विकास राष्ट्र समाज में महिलाओं की पर्याप्त भागीदारी उच्चतम स्तर की हो इस बात पर विश्वास रखता है। घर की चार दिवारी से निकलकर समाज में अपनी पहचान और आत्मनिर्भर हो सके परंतु क्या यह संभव हुआ है!

आरक्षण कानून तो बने परंतु स्वतंत्र भारत में क्या महिलाएं सशक्त हुई? 18 वीं शताब्दी में नारी मुक्ति आंदोलन पश्चिमी समाज में शुरुआत कर चुका था परंतु भारत ही एक ऐसा देश था जहां महिला आंदोलन की शुरुआत राजा राममोहन राय ने की थी ।वर्तमान परिदृश्य में भी हम देखें तो महिलाओं व पुरुषों के मध्य  भूमिका एवं वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो चुकी है ।

पहले परिवार में स्त्री व पुरुष की भूमिका हर रिश्ते में तय थी। आज देखे तो आत्मनिर्भर और सशक्त बनने के भंवर में महिलाएं अपनी प्रकृति व रूप- रंग सब ‌खो बैठी है। बाहर और घर के वातावरण में सामंजस्य बनाते-बनाते कब वह स्वयं के अस्तित्व को खत्म करते जा रही है उसका एहसास भी नहीं है। शास्त्रों में कहा गया है अति सर्वत्र वर्जयेत् ।आज फिर से समाज परिवार में भूमिका का विश्लेषण करने की आवश्यकता सभी व्यक्ति को है ।

जब हमें बुखार हो तो सर दर्द की गोली नहीं ले सकते इसी प्रकार सबको अपने अपने दायित्व की समझ होनी चाहिए। समता नहीं सम्मान की जरूरत है वह किसी डिग्री या बाजारवाद में नहीं मिलती है परंतु आत्म मंथन ,स्वयं की समझ विचारों के परिवर्तन से मिलती है ।जब निर्भय होकर प्रत्येक महिला ये बोले कि आज तक परिवार समाज कार्य स्थल में मेरा किसी प्रकार का शोषण नहीं हुआ है तभी नारी सशक्तिकरण वरदान सिद्ध होगी अन्यथा अभिशाप बनकर रह जाएगी।

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डॉ.सुषमा पांडेय
कार्य स्थल लैंगिक उत्पीड़न अध्यक्ष एवं परिवार परामर्श- दात्री, जिला – कोरबा(छ्.ग.)

दीपक साहू

संपादक

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